अमेरिका की ईरान को धमकी, युद्ध लड़ा तो मिट जाएगा पूरा देश

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प। -फाइल

नई दिल्ली: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने धमकी दी है कि अगर ईरान अमेरिका के साथ युद्ध लड़ता है तो आधिकारिक तौर पर उसका अंत हो जाएगा. डोनाल्ड ट्रंप ने अपने ट्वीट में ईरान को धमकी देते हुए लिखा, अगर ईरान लड़ना ही चाहता है तो यह उसका आधिकारिक तौर पर अंत होगा. अमेरिका को फिर कभी धमकी मत देना. वाशिंगटन में एक खुफिया रिपोर्ट आने के बाद दोनों देशों के बीच संभावित सैन्य टकराव को लेकर बहस छिड़ने पर ट्रंप के इस ट्वीट ने अमेरिका में इस डर को और हवा दी है कि दोनों देश एक दूसरे से युद्ध लड़ सकते हैं. अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट के मुताबिक ईरान अमेरिका के महत्वपूर्ण संस्थानों और संपत्ति को निशाना बना कर हमला कर सकता है. एक रिपोर्ट में अमेरिका के सुरक्षा अधिकार के हवाले से दावा किया गया है कि फारस की खाड़ी में ईरानी व्यापारिक जहाजों की जो तस्वीरें आई हैं उसके देखकर लगता है कि व्यापारिक जहाज की आड़ में युद्धपोत और मिसाइल ले जाया जा रहा है. हालांकि, अमेरिकी सरकार ने अब तक इसका कोई सबूत नहीं दिया है और हथियार ले जाने के अमेरिका के दावे की पुष्टि नहीं हुई है. इससे पहले अंतर्राष्ट्रीय मीडिया की जो रिपोर्ट सामने आई थी उसमें अमेरिकी अधिकारियों ने दावा किया था कि जिस तरह फारस खाड़ी से बाहर ईरानी समर्थित सैन्य बलों के लिए जहाजों का मूवमेंट हो रहा है वो ईरान के पुराने परिवहन पैटर्न से मिलता-जुलता नहीं है. यह रिपोर्ट अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव से उपजे खतरे के आकलन का हिस्सा था. बीते दिनों ईरान पर प्रतिबंध लगाते हुए अमेरिका ने कई देशों को उनसे कारोबारी रिश्ते तोड़ने को कहा था जिसमें भारत भी शामिल है. अमेरिका ने भारत के ईरान से तेल खरीदने की छूट को भी खत्म कर दिया था.

एग्जिट पोल के आंकड़ों पर रवीश कुमार का विश्‍लेषण

एग्जिट पोल के आंकड़ों पर रवीश कुमार का विश्‍लेषण
3 महीने से न्यूज़ चैनल और ढेर सारे पत्रकार गांव गांव में मोदी लहर खोज रहे थे, बता रहे थे कि नहीं मिल रही है. जब नहीं मिली तो अंडर करंट ढूंढने लगे. आख़िरकार आज उन्हें मोदी लहर मिल गई है.
रवीश कुमार, नई दिल्ली: मोदी लहर मिल गई है. तीन महीने से न्यूज़ चैनल और ढेर सारे पत्रकार गांव गांव में मोदी लहर खोज रहे थे, बता रहे थे कि नहीं मिल रही है. जब नहीं मिली तो अंडर करंट ढूंढने लगे. आख़िरकार आज उन्हें मोदी लहर मिल गई है. शुक्रिया एग्ज़िट पोल का. एग्ज़िट पोल के नतीजे बता रहे हैं कि मोदी लहर धुंआधार है. हर सर्वे में बीजेपी प्लस की सरकार आराम से बन रही है. यह पूरी तरह आप पर है कि आप एग्ज़िट पोल पर भरोसा करते हैं या नहीं करते हैं. दोनों ही स्थितियों में एग्ज़िट पोल वालों पर कोई फर्क नहीं पड़ता है. यह ज़रूर है कि 23 तारीख तक आप टीवी पर कुछ नहीं देख पाएंगे. यह शिकायत तभी करें जब आप 23 से पहले काफी कुछ देख पा रहे थे. बस दो बातें बताना चाहता हूं एक व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी से है और एक आस्ट्रेलिया से हैं. व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी की यह बात पसंद आई कि टीवी की आवाज़ कम रखें, मित्र या परिजनों के आस-पास रहें, ढीला सूती कपड़ा पहनें, कूलर या एसी चालू रखें, सांस गहरी लें, बीच बीच में मुस्कुराते रहें, संसार मोह-माया है, इसका स्मरण करते रहें.
आज एग्ज़िट पोल का पहला दिन है. अभी से घबरा जाएंगे तो कैसे चलेगा. अभी तो नतीजों के दिन तक आपको इसका सामना करना है. याद कीजिए आपने ऐसे कितने एग्ज़िट पोल देखे हैं, उनका सामना किया है. ग़लत होने के बाद फिर से देखने की हिम्मत जुटाई है. इस आधार पर मैंने एग्ज़िट पोल को लेकर एक थ्योरी बनाई है. पेंटेट नहीं हुआ है और न ही नोबेल प्राइज़ मिला है. तो एग्ज़िट पोल दुनिया का पहला वैज्ञानिक काम है जो ग़लत होने के बाद भी ग़लत होने के लिए किया जाता है. एक थ्योरी और निकल कर आई है. वह यह है कि एग्ज़िट पोल में संख्या गलत हो सकती है मगर ट्रेंड सही हो जाता है. सभी पोल ग़लत नहीं होते हैं. कुछ पोल सही भी होते हैं. इस बार के सभी पोल में बीजेपी की सरकार बन रही है. तो ग़लत कौन सा पोल होगा, यह 23 को पता चलेगा. न्यूज़ चैनल एग्ज़िट पोल को लेकर काफी सीरीयस हैं. आस्ट्रेलिया में भी लोग सीरीयस थे. वहां जितने भी चुनाव के पहले ओपिनियन पोल्स हुए, 50 से अधिक वे सभी ग़लत निकले. एग्ज़िट पोल नहीं थे, प्री पोल्स सर्वे ग़लत निकले हैं.
मगर इस ग़लती का एक अंजाम बहुत अच्छा हुआ कि सर्वे के नतीजे देखकर लेबर पार्टी ने जश्न मना लिया कि वे जीत रहे हैं. जब रिज़ल्ट निकला तो जश्न मनाने का मौक़ा लिबरल पारटी को. लेकिन इससे घबराने की ज़रूरत नहीं है. सर्वे और एग्जिट पोल हर जगह ग़लत होते हैं. अमरीका और ब्रिटेन जैसे मुल्क में एक ही दिन मतदान होता है और उसी दिन नतीजा आ जाता है. वहां एग्ज़िट पोल नहीं होता है. क्योंकि मतदान खत्म होने और नतीजे आने में समय का बेहद कम अंतर होता है. इसलिए मतदान के पहले कराए गए पोल को लेकर ही वहां के चैनलों में टाइम काटा जाता है.
भारत एक जटिल मुल्क है. सीटों की संख्या भी अधिक है. कई बार यहां चुनाव आयोग भी फैक्टर हो जाता है तो किसी सर्वे में नहीं दिखता है. बगैर चुनाव आयोग के फैक्टर के कोई पोल कैसे सही हो सकता है. आप एग्ज़िट पोल के ग़लत होने से बिल्कुल न घबराएं. बल्कि स्टार्ट अप के तहत एग्ज़िट पोल का बिजनेस सेटअप करना चाहते हैं तो अवश्य करें. हमने देखा है कि कई चुनावों में कई सर्वे कंपनियों के सर्वे गलत निकले. मगर अगले चुनाव में उन सबको बिजनेस मिला है. इतना तगड़ा बिजनेस है जिसमें ग़लत साबित होने पर आपको एक और बार ग़लत होने का मौक़ा मिलता है. कई सारे एग्जिट पोल हैं. हम नहीं करते हैं लेकिन हम सबका औसत बताते हैं. 2014 में बीजेपी को अकेले 282 सीटें आई थीं. एनडीए को 336.
सुदर्शन न्यूज़, रिपब्लिक-सी वोटर, रिपब्लिक जन की बात, सुवर्णा न्यूज़ 24×7, साक्षी टीवी, न्यूज़ नेशन, सारे एग्ज़िट पोल एक तरफ अमित शाह का दावा एक तरफ. उन्होंने दावा किया है कि 300 सीटें आ रही हैं. आराम से सरकार बन रही है. यूपी के बारे में अमित शाह ने कहा था कि 73 से एक सीट कम नहीं आएगी बल्कि 74 भी हो सकता है. याद रखिए कि अमित शाह 2014 में जब प्रभारी थे तभी 72 सीटें आई थीं. 2015 में अमित शाह ने बिहार के लिए मिशन 185 रखा था, बीजेपी को 99 सीटें आईं, 86 सीटें कम आईं. 2016 में बंगाल विधानसभा में मिशन 150 का लक्ष्य था, 3 सीटें आईं, 147 सीटें कम आईं. यूपी विधानसभा 2017 में मिशन 203 का लक्ष्य थ, 325 सीटें आ गई थीं. 122 सीटें अधिक आईं. 2017 में गुजरात विधानसभा में मिशन 150 का लक्ष्य था, बीजेपी को 99 सीटें आईं, 51 सीटें कम आईं. 2017 में हिमाचल प्रदेश में मिशन 50 प्लस का लक्ष्य था, 44 सीटें आईं, 6 सीटें कम आईं. 2018 में कर्नाटक विधानसभा में मिशन 150 था, बीजेपी को 104 सीटें आईं. 46 सीटें कम आईं.
आपने साइलेंट वोटर के बारे में काफी कुछ सुना था. साइलेंट वोटर क्या होता है. क्या यह डरा हुआ वोटर होता है या इसकी अपनी रणनीति होती है. अकादमी की दुनिया में कई दशक से इस पर रिसर्च होता रहा है. दुनिया भर में. क्या हम कभी साइलेंट वोटर को जान पाएंगे. यही वो साइलेंट वोटर है जो अचानक सारे आंकलन पलट देता है. बिहार मे लालू यादव इसे बक्से से निकला जिन्न कहते थे. लोकतंत्र में या तानाशाही में नागरिक कब साइलेंट हो जाता है इसके अलग-अलग कारण हो सकते हैं. अंग्रेज़ी में इस प्रक्रिया को ‘pluralistic ignorance’ के ज़रिए समझा गया है. मतलब नागरिक का बर्ताव पब्लिक में या भीड़ में उसके जैसा होता है लेकिन अकेले में वह ठीक उसका उल्टा सोचता है. इस बारे में एक किताब है आप पढ़ सकते हैं. Cristina बिक्यरी की The grammar of society. एक और किताब है Timur Kuran की Private Lies, Public Truths जिसमें पूर्वी यूरोप की कम्युनिस्ट सरकारों के पतन का अध्ययन किया गया है. सोवियत संघ का विघटन हुआ तो पूर्वी यूरोप के कई मुल्कों में कम्युनिस्ट सरकारें भरभरा कर गिर गईं. किसी को अंदाज़ा नहीं हुआ. क्योंकि सार्वजनिक रूप से जनता सरकार का समर्थन करती थी मगर अकेले में विरोध करती थी. हमने दोनों किताबें नहीं पढ़ी हैं मगर हमारे मित्र वत्सल ने बताया कि साइलेंट वोटर के बारे में दर्शकों को बताया जाना चाहिए. जब लोगों को पब्लिक में बोलने की आज़ादी नहीं होती, भय होता है तो वे चुप हो जाते हैं. यह दोनों ही अध्ययन तानाशाही सरकारों के हैं. भारत में लोकतंत्र है. लेकिन क्या भारत जैसे आजाद मुल्क में साइलेंट वोटर को अलग से समझा जा सकता है. उसे कैसे समझा जाना चाहिए. (साभार)

दिल्ली गैंगवॉर: द्वारका मोड़ में बीच सड़क पर खूनी खेल, दो गैंगस्टर ढेर

दिल्ली गैंगवॉर: द्वारका मोड़ में बीच सड़क पर खूनी खेल, दो गैंगस्टर ढेर
नई दिल्ली:
रविवार को द्वारका मोड़ मेट्रो स्टेशन के पास बीच सड़क गैंगवार हुई। बदमाशों ने ट्रैफिक रोककर एक-दूसरे पर गोलियां बरसाईं। इसमें एक गैंगस्टर की मौत हो गई। गोलियों की आवाज सुनकर मौके पर पहुंची पुलिस ने मोर्चा संभाला और जवाबी फायरिंग में एक बदमाश को भी मार गिराया। पुलिस के मुताबिक, मरने वाले एक बदमाश की पहचान मंजीत महल गैंग के राइट हैंड प्रवीण गहलोत के रूप में हुई है। दूसरे का नाम विकास दलाल है। विकास भी पहले इसी गैंग से जुड़ा था। गिरोह से अलग होने के बाद दुश्मनी पनपी। विकास को सूचना मिली थी कि प्रवीण द्वारका आ रहा है। उसने अपने तीन-चार साथियों के साथ तीन किमी तक प्रवीण का पीछा किया। दिल्ली में गैंगवार की इतनी भयानक तस्वीर आपने नहीं देखी होगी। द्वारका मोड़ मेट्रो स्टेशन के नीचे ठसाठस ट्रैफिक के बीच दो कार सवारों में यह खूनी खेल हुआ। घटना से जुड़े वायरल विडियो में दिख रहा है कि स्विफ्ट कार से एक बदमाश हेल्मेट पहनकर उतरता है, ट्रैफिक रुकवाता है और फिर रिट्ज पर गोलियां दागने लगता है। द्वारका मोड़ पहुंचकर उसने फायरिंग शुरू कर दी। प्रवीण की गाड़ी पर करीब एक दर्जन गोलियां चलाई गईं। जब प्रवीण को गोली नहीं लगी तो विकास नीचे उतरा और पास जाकर फायरिंग की। दूसरी तरफ से भी गोलियां चलाई गईं। भीड़ भरी सड़क पर अंधाधुंध गोलीबारी से अफरातफरी मच गई। जिसे जहां जगह मिली, वहीं छुपने के लिए भागा। पुलिस के अनुसार, उसे 3.57 बजे गैंगवार की पहली कॉल मिली थी। मौके पर पहुंची पुलिस ने जवाब में तीन गोलियां चलाईं। इसमें एक बदमाश मारा गया, जबकि दूसरा घायल हुआ है। माना जा रहा है कि विकास की मौत पुलिस की गोली से हुई है। उसके साथ आए बदमाश भाग निकले। पिछले 6 महीने में द्वारका जिले में यह तीसरी गैंगवार है। मंजीत महल गैंग में प्रवीण फाइनैंस का काम देखता था। उस पर कई केस दर्ज हैं। वहीं, विकास पिछले साल अक्टूबर में फरीदाबाद पुलिस की कस्टडी से भागा था। कुछ दिन पहले भी उसने प्रवीण के साथियों पर हमला किया था।

प्रेम परिभाषा में बंधता नहीं

प्रेम परिभाषा में बंधता नहीं

मस्तिष्क का काम है रहस्य को रहस्य न रहने दे, उसे सुस्पष्ट परिभाषा में बांध ले। मगर कुछ चीजें हैं जो परिभाषा में बंधती नहीं। प्रेम परिभाषा में बंधता नहीं। लाख करो उपाय, परिभाषा छोटी पड़ जाती है। व्याख्या में समाता नहीं। बड़े बड़े हार गए, सदियां बीत गईं, प्रेम के संबंध में कितनी बातें कही गईं और प्रेम के संबंध में एक भी बात कही नहीं जा सकी है। जो कहा गया, सब ओछा पड़ा। जो कहा गया, सब थोथा सिद्ध हुआ। प्रेम इतना बड़ा है, इतना विराट है कि यह आकाश भी छोटा है।

प्रेम के आकाश से यह आकाश छोटा है। ऐसे कितने ही आकाश उसमें समा जाएं। महावीर ने इस आकाश को अनंत कहा है, और आत्मा के आकाश को अनंतानंत। अगर अनंत को अनंत से गुणा कर दें। असंभव बात। क्योंकि अनंत का अर्थ ही हो गया कि उसकी कोई सीमा नहीं, अब उसका गुणा कैसे करोगे? कोई आंकड़ा नहीं। लेकिन महावीर ने कहा, अगर यह हो सके कि अनंत को हम अनंत से गुणा कर सकें, तो अनंतानंत, तो हमारे भीतर के आकाश की थोड़ीसी रूपरेखा स्पष्ट होगी।

लेकिन मन हर चीज को समझ कर, जान कर स्पष्ट कर लेना चाहता है। क्यों? मस्तिष्क की यह आकांक्षा क्यों है? यह इसलिए कि जो स्पष्ट हो जाता है, मस्तिष्क उसका मालिक हो जाता है। जो राज राज नहीं रह जाते, मस्तिष्क उनका उपयोग करने लगता है साधन की तरह। लेकिन कुछ राज हैं जो राज ही हैं और राज ही रहेंगे। मस्तिष्क उन पर कभी मालकियत नहीं कर सकता और उनका कभी साधन की तरह उपयोग नहीं हो सकता। वे परम साध्य हैं। सभी साधन उनके लिए हैं। प्रेम जिस तरफ इशारा करता है, वह इशारा परमात्मा की तरफ है। प्रेम का तीर जिस तरफ चलता है, वह परमात्मा है।

प्रेम का लक्ष्य सदा परमात्मा है। इसलिए तुम जिससे भी प्रेम करो उसमें तुम्हें परमात्मा की झलक अनुभूत होने लगेगी। इसीलिए तो प्रेमियों को लोग पागल कहते हैं। मजनू को लोग पागल कहते हैं; क्योंकि उसे लैला परमात्मा मालूम होती है। शीरीं को लोग पागल कहते हैं, क्योंकि फरहाद उसे परमात्मा मालूम होता है। पागल न कहें तो क्या कहें?? एक साधारणसी स्त्री, एक साधारणसा पुरुष परमात्मा कैसे? लेकिन उन्हें प्रेम के रहस्य का कुछ अनुभव नहीं है। प्रेम की जहां भी छाया पड़ती है, वहीं परमात्मा का आविष्कार हो जाता है। प्रेम भरी आंख से फूल को देखोगे तो फूल परमात्मा है। और प्रेम भरी आंख से कांटे को देखोगे तो कांटा भी परमात्मा है। प्रेम की आंख जहां पड़ी, वहीं परमात्मा उघड़ आता है।

सपना यह संसार

ओशो

क्या आरएसएस के ब्राह्मण संस्थापक – संचालक इसरायली यहुदी हैं?

मोहन भागवत यहां की हर जातियों पर किताब लिखवा रहे है लेकिन अपनी ख़ुद की जाति पर लिखने से कतरा रहे है। लिखो भागवत कि कैसे आपके बाप दादा बेन इस्राईल से भगाए जाने पर शरणार्थी बनकर भारत आये थे?

आर.एस.एस की स्थापना चितपावन ब्राह्मणों ने की और इसके ज़ियादातर सरसंघचालक अर्थात् मुखिया अब तक सिर्फ़ चितपावन ब्राह्मण होते आए हैं।

क्या आप जानते हैं यह चितपावन ब्राह्मण कौन होते हैं?

चितपावन ब्राह्मण भारत के पश्चिमी किनारे स्थित कोंकण के निवासी हैं. 18 वीं शताब्दी तक चितपावन ब्राह्मणों को देशस्थ ब्राह्मणों द्वारा निम्न स्तर का समझा जाता था. यहां तक कि देशस्थ ब्राह्मण नासिक और गोदावरी स्थित घाटों को भी पेशवा समेत समस्त चितपावन ब्राह्मणों को उपयोग नहीं करने देते थे.

दरअसल कोंकण वह इलाका है जिसे मध्यकाल में विदशों से आने वाले तमाम समूहों ने अपना निवास बनाया जिनमें पारसी, बेने इस्राईली, कुडालदेशकर गौड़ ब्राह्मण, कोंकणी सारस्वत ब्राह्मण और चितपावन ब्राह्मण, जो सबसे अंत में भारत आए, प्रमुख हैं.

आज भी भारत की महानगरी बंबई के कोलाबा में रहने वाले बेन इस्राईली लोगों की लोककथाओं में इस बात का ज़िक्र आता है कि चितपावन ब्राह्मण उन्हीं 14 इस्राईली यहूदियों के ख़ानदान से हैं जो किसी समय कोंकण के तट पर आए थे.

चितपावन ब्राह्मणों के बारे में 1707 से पहले बहुत कम जानकारी मिलती है. इसी समय के आसपास चितपावन ब्राह्मणों में से एक बालाजी विश्वनाथ भट्ट रत्नागिरी से चलकर पुणे सतारा क्षेत्र में पहुँचा. उसने किसी तरह छत्रपति शाहू का दिल जीत लिया और शाहूजी ने प्रसन्न होकर बालाजी विश्वनाथ भट्ट को अपना पेशवा यानी कि प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया. यहीं से चितपावन ब्राह्मणों ने सत्ता पर पकड़ बनानी शुरू कर दी क्योंकि वह समझ गए थे कि सत्ता पर पकड़ बनाए रखना बहुत ज़रुरी है. मराठा साम्राज्य का अंत होने तक पेशवा का पद इसी चितपावन ब्राह्मण बालाजी विश्वनाथ भट्ट के परिवार के पास रहा.

एक चितपावन ब्राह्मण के मराठा साम्राज्य का पेशवा बन जाने का असर यह हुआ कि कोंकण से चितपावन ब्राह्मणों ने बड़ी संख्या में पुणे आना शुरू कर दिया जहाँ उन्हें महत्वपूर्ण पदों पर बैठाया जाने लगा. चितपावन ब्राह्मणों को न सिर्फ़ मुफ़्त में ज़मीनें आबंटित की गईं बल्कि उन्हें तमाम करों (टैक्स) से भी मुक्ति प्राप्त थी. चितपावन ब्राह्मणों ने अपनी जाति को सामाजिक और आर्थिक रूप से ऊपर उठाने के इस अभियान में ज़बरदस्त भ्रष्टाचार किया. इतिहासकारों के अनुसार 1818 में मराठा साम्राज्य के पतन का यह प्रमुख कारण था. रिचर्ड मैक्सवेल ने लिखा है कि राजनीतिक अवसर मिलने पर सामाजिक स्तर में ऊपर उठने का यह बेमिशाल उदाहरण है. (Richard Maxwell Eaton. A social history of the Deccan, 1300-1761: eight Indian lives, Volume 1. p. 192)

चितपावन ब्राह्मणों की भाषा भी इस देश के भाषा परिवार से नहीं मिलती थी. 1940 तक ज़ियादातर कोंकणी चितपावन ब्राह्मण अपने घरों में चितपावनी कोंकणी बोली बोलते थे जो उस समय तेजी से विलुप्त होती बोलियों में शुमार थी.

आश्चर्यजनक रूप से चितपावन ब्राह्मणों ने इस बोली को बचाने का कोई प्रयास नहीं किया. उद्देश्य उनका सिर्फ़ एक ही था कि ख़ुद को मुख्यधारा में स्थापित कर उच्च स्थान पर काबिज़ हुआ जाए. खुद को बदलने में चितपावन ब्राह्मण कितने माहिर हैं इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अंग्रेज़ों ने जब देश में इंग्लिश एजुकेशन की शुरुआत की तो इंग्लिश मीडियम स्कूलों में अपने बच्चों का दाखिला कराने वालों में चितपावन ब्राह्मण सबसे आगे थे.

इस तरह अत्यंत कम जनसंख्या वाले चितपावन ब्राह्मणों ने, जो मूलरूप से इस्राईली यहूदी थे, न सिर्फ़ इस देश में ख़ुद को स्थापित किया बल्कि आर.एस.एस नाम का संगठन बना कर वर्तमान में देश के नीति नियंत्रण करने की स्थिति तक ख़ुद को पहुँचाया है।

लेखक
प्रोफेसर विलास खरात
डायरेक्टर डा. बाबा साहब अम्बेडकर रिसर्च सेंटर, नई दिल्ली

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वो आम का पेड़

बस 2 मिनिट लगेगे पुरा पढना

एक बच्चे को आम का पेड़ बहुत पसंद था।

जब भी फुर्सत मिलती वो आम के पेड के पास पहुच जाता।

पेड के उपर चढ़ता,आम खाता,खेलता और थक जाने पर उसी की छाया मे सो जाता।

उस बच्चे और आम के पेड के बीच एक अनोखा रिश्ता बन गया।

बच्चा जैसे-जैसे बडा होता गया वैसे-वैसे उसने पेड के पास आना कम कर दिया।
कुछ समय बाद तो बिल्कुल ही बंद हो गया।

आम का पेड उस बालक को याद करके अकेला रोता।

एक दिन अचानक पेड ने उस बच्चे को अपनी तरफ आते देखा और पास आने पर कहा,

“तू कहां चला गया था? मै रोज तुम्हे याद किया करता था। चलो आज फिर से दोनो खेलते है।”

बच्चे ने आम के पेड से कहा,
“अब मेरी खेलने की उम्र नही है

मुझे पढना है,लेकिन मेरे पास फीस भरने के पैसे नही है।”

पेड ने कहा,
“तू मेरे आम लेकर बाजार मे बेच दे,
इससे जो पैसे मिले अपनी फीस भर देना।”

उस बच्चे ने आम के पेड से सारे आम तोड़ लिए और उन सब आमो को लेकर वहा से चला गया।

उसके बाद फिर कभी दिखाई नही दिया।

आम का पेड उसकी राह देखता रहता।

एक दिन वो फिर आया और कहने लगा,
“अब मुझे नौकरी मिल गई है,
मेरी शादी हो चुकी है,

मुझे मेरा अपना घर बनाना है,इसके लिए मेरे पास अब पैसे नही है।”
आम के पेड ने कहा,

“तू मेरी सभी डाली को काट कर ले जा,उससे अपना घर बना ले।”
उस जवान ने पेड की सभी डाली काट ली और ले के चला गया।

आम के पेड के पास अब कुछ नहीं था वो अब बिल्कुल बंजर हो गया था।

कोई उसे देखता भी नहीं था।
पेड ने भी अब वो बालक/जवान उसके पास फिर आयेगा यह उम्मीद छोड दी थी।

फिर एक दिन अचानक वहाँ एक बुढा आदमी आया। उसने आम के पेड से कहा,

“शायद आपने मुझे नही पहचाना,
मैं वही बालक हूं जो बार-बार आपके पास आता और आप हमेशा अपने टुकड़े काटकर भी मेरी मदद करते थे।”

आम के पेड ने दु:ख के साथ कहा,

“पर बेटा मेरे पास अब ऐसा कुछ भी नही जो मै तुम्हे दे सकु।”

वृद्ध ने आंखो मे आंसु लिए कहा,

“आज मै आपसे कुछ लेने नही आया हूं बल्कि आज तो मुझे आपके साथ जी भरके खेलना है,

आपकी गोद मे सर रखकर सो जाना है।”

इतना कहकर वो आम के पेड से लिपट गया और आम के पेड की सुखी हुई डाली फिर से अंकुरित हो उठी।

वो आम का पेड़ कोई और नही हमारे माता-पिता हैं दोस्तों ।

जब छोटे थे उनके साथ खेलना अच्छा लगता था।

जैसे-जैसे बडे होते चले गये उनसे दुर होते गये।
पास भी तब आये जब कोई जरूरत पडी,
कोई समस्या खडी हुई।

आज कई माँ बाप उस बंजर पेड की तरह अपने बच्चों की राह देख रहे है।

जाकर उनसे लिपटे,
उनके गले लग जाये

फिर देखना वृद्धावस्था में उनका जीवन फिर से अंकुरित हो उठेगा।

आप से प्रार्थना करता हूँ यदि ये कहानी अच्छी लगी हो तो कृपया ज्यादा से ज्यादा लोगों को भेजे ताकि किसी की औलाद सही रास्ते पर आकर अपने माता पिता को गले लगा सके !

ओशो का हिन्दी साहित्य

ओशो का हिन्दी साहित्य

उपनिषद ~

॰ सर्वसार उपनिषद
॰ कैवल्य उपनिषद
॰ अध्यात्म उपनिषद
॰ कठोपनिषद
॰ ईशावास्य उपनिषद
॰ निर्वाण उपनिषद
॰ आत्म – पूजा उपनिषद
॰ केनोपनिषद
॰ मेरा स्वर्णिम भारत ( विविध उपनिषद – सूत्र )

कृष्ण ~
॰ गीता – दर्शन ( आठ भागोँ मेँ अठारह अध्याय )
॰ कृष्ण – स्मृति

कबीर ~
॰ सुनो भई साधो
॰ कहै कबीर दीवाना
॰ कहै कबीर मैँ पूरा पाया
॰ न कानोँ सुना न आंखोँ देखा ( कबीर व फरीद )

बुद्ध ~
॰ एस धम्मो सनतनोँ ( बारह भागोँ मेँ )

अष्टावक्र ~
॰ अष्टावक्र महागीता ( छह भागोँ मेँ )

महावीर ~
॰ महावीर – वाणी ( दो भागोँ मेँ )
॰ जिन – सूत्र ( दो भागोँ मेँ )
॰ महावीर या महाविनाश
॰ महावीर : मेरी दृष्टि मेँ
॰ ज्योँ की त्योँ धरि दीन्हीँ चदरिया

लाओत्से ~
॰ ताओ उपनिषद ( छह भागोँ मेँ )

अन्य रहस्यदर्शी ~
॰ अथातो भक्ति जिज्ञासा ( शांडिल्य )
॰ भक्ति सूत्र ( नारद )
॰ शिव – सूत्र ( शिव )
॰ भजगोविन्दम् मूढमते (आदिशंकराचार्य)
॰ एक ओँकार सतनाम ( नानक )
॰ जगत तरैया भोर की ( दयाबाई )
॰ बिन घन परत फुहार ( सहजोबाई )
॰ पद घुंघरू बांध ( मीरा )
॰ नहीँ सांझ नहीँ भोर ( चरणदास )
॰ संतो , मगन भया मन मेरा ( रज्जब )
॰ कहै वाजिद पुकार ( वाजिद )
॰ मरौ हे जोगी मरौ ( गोरख )
॰ सहज – योग ( सहरपा – तिलोपा )
॰ बिरहिनी मंदिर दियना बार ( यारी )
॰ प्रेम – रंग – रस ओढ चदरिया ( दूलन )
॰ दरिया कहै सब्द निरबाना ( दरियादास बिहारवाले )
॰ हंसा तो मोती चुगैँ ( लाल )
॰ गुरू – परताप साध की संगति ( भीखा )
॰ मन ही पूजा मन ही धूप ( रैदास )
॰ झरत दसहुं दिस मोती ( गुलाल )
॰ नाम सुमिर मन बावरे ( जगजीवन )
॰ अरी , मैँ तो नाम के रंग छकी ( जगजीवन )
॰ कानोँ सुनी सो झूठ सब ( दरिया )
॰ हरि बोलौ हरि बोल ( सुंदरदास )
॰ ज्योति से ज्योति जले ( सुंदरदास )
॰ जस पनिहार धरे सिर गागर ( धरमदास )
॰ का सोवै दिन रैन ( धरमदास )
॰ सबै सयाने एक मत ( दादू)
॰ पिव पिव लागी प्यास ( दादू )
॰ अजहूं चेत गंवार ( पलटू )
॰ सपना यह संसार ( पलटू )
॰ काहे होत अधीर ( पलटू )
॰ कन थोरे कांकर घने ( मलूकदास )
॰ रामदुवारे जो मरे ( मलूकदास )
॰ जरथुस्त्र : नाचता – गाता मसीहा ( जरथुस्त्र )

प्रश्नोत्तर ~
॰ नहिँ राम बिन ठांव
॰ प्रेम – पंथ ऐसो कठिन
॰ उत्सव आमार जाति , आनंद आमार गोत्र
॰ मृत्योर्मा अमृतं गमय
॰ प्रीतम छवि नैनन बसी
॰ रहिमन धागा प्रेम का
॰ उड़ियो पंख पसार
॰ सुमिरन मेरा हरि करैँ
॰ पिय को खोजन मैँ चली
॰ साहेब मिल साहेब भये
॰ जो बोलैँ तो हरिकथा
॰ बहुरि न ऐसा दांव
॰ ज्यूं था त्यूं ठहराया
॰ ज्यूं मछली बिन नीर
॰ दीपक बारा नाम का
॰ अनहद मेँ बिसराम
॰ लगन महूरत झूठ सब
॰ सहज आसिकी नाहिँ
॰ पीवत रामरस लगी खुमारी
॰ रामनाम जान्यो नहीँ
॰ सांच सांच सो सांच
॰ आपुई गई हिराय
॰ बहुतेरे हैँ घाट
॰ कोँपलेँ फिर फूट आईँ
॰ फिर पत्तोँ की पांजेब बजी
॰ फिर अमरित की बूंद पड़ी
॰ क्या सोवै तू बावरी
॰ चल हंसा उस देस
॰ कहा कहूं उस देस की
॰ पंथ प्रेम को अटपटो
॰ माटी कहै कुम्हार सूं
॰ मैँ धार्मिकता सिखाता हूं , धर्म नहीँ

तंत्र ~
॰ संभोग से समाधि की ओर
॰ तंत्र – सूत्र ( पांच भागोँ मेँ )

योग ~
॰ पतंजलि : योग – सूत्र ( पांच भागोँ मेँ )
॰ योग : नये आयाम

झेन , सूफी और उपनिषद की कहानियां ~
॰ बिन बाती बिन तेल
॰ सहज समाधि भली
॰ दीया तले अंधेरा

बोध – कथा ~
॰ मिट्टी के दीये

ध्यान , साधना ~
॰ ध्यान विज्ञान
॰ ध्यानयोग : प्रथम और अंतिम मुक्ति
॰ नेति – नेति
॰ चेति सकै तो चेति
॰ हसिबा , खेलिबा , धारिबा ध्यानम्
॰ समाधि कमल
॰ साक्षी की साधना
॰ धर्म साधना के सूत्र
॰ मैँ कौन हूँ
॰ समाधि के द्वार पर
॰ अपने माहिँ टटोल
॰ ध्यान दर्शन
॰ तृषा गई एक बूंद से
॰ ध्यान के कमल
॰ जीवन संगीत
॰ जो घर बारे आपना
॰ प्रेम दर्शन

साधना – शिविर ~
॰ साधना – पथ
॰ मैँ मृत्यु सिखाता हूँ
॰ जिन खोजा तिन पाइयां
॰ समाधि के सप्त द्वार ( ब्लावट्स्की )
॰ साधना – सूत्र ( मेबिल कोलिन्स )
॰ ध्यान – सूत्र
॰ जीवन ही है प्रभु
॰ असंभव क्रांति
॰ रोम – रोम रस पीजिए

अंतरंग वार्ताएं ~
॰ संबोधि के क्षण
॰ प्रेम नदी के तीरा
॰ सहज मिले अविनाशी
॰ उपासना के क्षण

विचार – पत्र ~
॰ क्रांति – बीज
॰ पथ के प्रदीप

पत्र – संकलन ~
॰ अंतर्वीणा
॰ प्रेम की झील मेँ अनुग्रह के फूल
॰ ढाई आखर प्रेम का
॰ पद घुंघरू बांध
॰ प्रेम के फूल
॰ प्रेम के स्वर
॰ पाथेय

राष्ट्रीय और सामाजिक समस्याएं ~
॰ देख कबीरा रोया
॰ स्वर्ण पाखी था जो कभी और अब है भिखारी जगत का
॰ शिक्षा मेँ क्रांति
॰ नये समाज की खोज
॰ नये भारत की खोज
॰ नये भारत का जन्म
॰ नारी और क्रांति
॰ शिक्षा और धर्म
॰ भारत का भविष्य

विविध ~
॰ अमृत – कण
॰ मैँ कहता आंखन देखी
॰ एक -एक कदम
॰ जीवन क्रांति के सूत्र
॰ जीवन रहस्य
॰ करूणा और क्रांति
॰ विज्ञान , धर्म और कला
॰ शून्य के पार
॰ प्रभु मंदिर के द्वार पर
॰ तमसो मा ज्योतिर्गमय
॰ प्रेम है द्वार प्रभु का
॰ अंतर की खोज
॰ अमृत की दिशा
॰ अमृत वर्षा
॰ अमृत द्वार
॰ चित्त चकमक लागे नाहिँ
॰ एक नया द्वार
॰ प्रेम गंगा
॰ समुंद समाना बुंद मेँ
॰ सत्य की प्यास
॰ शून्य समाधि
॰ व्यस्त जीवन मेँ ईश्वर की खोज
॰ अज्ञात की ओर
॰ धर्म और आनंद
॰ जीवन – दर्शन
॰ जीवन की खोज
॰ क्या ईश्वर मर गया है
॰ नानक दुखिया सब संसार
॰ नये मनुष्य का धर्म
॰ धर्म की यात्रा
॰ स्वयं की सत्ता
॰ सुख और शांति
॰ अनंत की पुकार

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गुरजिएफ की अधूरी जानकारी

OSHO has talked about Gudgief in various discourses and clearly mentioned that it’s failed system

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गुरजिएफ की अधूरी जानकारी:
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अब जैसे कि गुरजिएफ जैसे लोगों को, जो कि एक अर्थ में अपरूटेड हैं, इनके पीछे कोई हजारों वर्ष का काम नहीं है, तो इनको पता नहीं है। इनको पता नहीं है, हजारों वर्ष का काम नहीं है। और फिर इस आदमी ने दस—पच्चीस अलग—अलग तरह के लोगों से मिलकर कुछ इकट्ठा किया है। उसमें कई यंत्रों के सामान यह ले आया है। वे सब अपनी—अपनी जगह ठीक थे, लेकिन सब इकट्ठे होकर बड़े अजीब हो गए हैं। उनमें से कभी कोई किसी पर काम कर जाता है, लेकिन पूरा किसी पर काम नहीं कर पाता। इसलिए गुरजिएफ के पास जितने लोगों ने काम किया, पूर्णता पर उनमें से कोई भी नहीं पहुंच सका। वह पहुंच नहीं सकता। क्योंकि जब वह आता है तो कोई चीज एक काम कर जाती है उस पर, तो वह उत्सुक तो हो जाता है और प्रवेश कर जाता है, लेकिन दूसरी चीजें उलटा काम करने लगती हैं। क्योंकि सिस्टम जो है, पूरी की पूरी सिस्टम नहीं है एक। कहना चाहिए कि मल्टी—सिस्टम्स का बहुत कुछ उसमें ले लिया है उसने।
अच्छा और कुछ सिस्टम्स का उसे बिलकुल पता नहीं है। उसके पास उनकी जानकारी नहीं है। उसकी ज्यादा जानकारी सूफी दरवेशों से है। उसे तिबेतन योग का कोई विशेष पता नहीं है; उसे हठयोग का भी कोई बहुत विशेष पता नहीं है। जो उसने सुना है, वह भी विरोधियों के मुंह से सुना है; वह भी दरवेशों से सुना है। वह हठयोगी नहीं है। तो उसकी जो जानकारी हठयोग के बाबत या कुंडलिनी के बाबत जो भी जानकारी है, वह दुश्मन के मुंह से सुनी गई जानकारी है, विपरीत पथगामियों के द्वारा सुनी गई जानकारी है। उस जानकारी के आधार पर वह जो कह रहा है वह बहुत अर्थों में तो कभी असंगत ही हो जाता है।
जैसे कुंडलिनी के बाबत तो उसने निपट नासमझी की बात कही; उसका उसे कुछ पता ही नहीं है। वह उसको कुंडा—बफर ही कहे चला जा रहा है। और बफर अच्छा शब्द नहीं है। वह यह कह रहा है कि कुंडलिनी एक ऐसी चीज है, जिसके कारण आप ज्ञान को उपलब्ध नहीं हो पाते, वह बफर की तरह काम कर रही है। और उसको पार करना जरूरी है। उसे मिटाकर पार कर जाना जरूरी है। इसलिए उसको जगाने की तो चिंता में ही मत पड़ना।
अब उसे पता ही नहीं है कि वह क्या कह रहा है। बफर्स हैं व्यक्तित्व में, ऐसी चीजें हैं जिनकी वजह से हम कई तरह के शॉक्स झेल जाते हैं। कुंडलिनी वह नहीं है; कुंडलिनी तो शॉक है। मगर उसे पता नहीं है। कुंडलिनी तो खुद बड़े से बड़ा शॉक है। जब कुंडलिनी जगती है तो आपको बड़े से बड़ा शॉक लगता है आपके व्यक्तित्व में। बफर और हैं दूसरे आपके भीतर, जिनसे वह शॉक एज्जार्बर्स की तरह वे काम करते हैं, वे पी जाते हैं उसे। उन बफर्स को तोड्ने की जरूरत है। लेकिन वह उसको ही बफर समझ रहा है। और उसका कारण है कि उसे कुछ पता नहीं है। अनुभव तो है ही नहीं उसे उसका, जिनको अनुभव है उनके पास बैठकर उसने कोई बात भी नहीं सुनी।
और इसलिए कई दफे बड़ी अजीब हालतें हो जाती हैं। गुरजिएफ, कृष्णमूर्ति, इन सब के साथ बहुत अजीब हालत हो गई है। इनके साथ अजीब हालत यह है कि वे जो सीक्रेट्स हैं उन शब्दों के पीछे और उन शक्तियों के पीछे, उनका कभी भी उन्हें कोई व्यवस्थित ज्ञान नहीं हो सका। और कठिन भी बहुत है। असल में, एक जन्म में संभव भी नहीं है। अगर एक आदमी दस— बीस जन्मों में दस—बीस व्यवस्थाओं के बीच बड़ा हो, तभी संभव है, नहीं तो संभव नहीं है। दस—बीस जन्मों में दस—बीस व्यवस्थाओं के बीच बड़ा हो, तब कहीं किसी अंतिम जन्म में वह उन सब के बीच कोई सिंथीसिस खोज सकता है, नहीं तो नहीं खोज सकता।
लेकिन आमतौर से ऐसा होता है कि एक आदमी एक व्यवस्था से पहुंच जाता है तो दूसरा जन्म ही क्यों ले? बात ही खत्म हो गई। इसलिए सिंथीसिस नहीं हो पाती। और इधर मैं सोचता हूं इस पर, इस पर कभी काम करने जैसा है कि सारी दुनिया की व्यवस्थाओं के बीच एक सिंथीसिस संभव है। अलग—अलग छोर से पकड़ना पड़ेगा; घटनाएं वही घटती हैं, लेकिन अलग— अलग तरकीबें हैं उनको घटाने की
Jktp:9

वर्ण व्यवस्था और जातिवादी शासन का एक सनसनीखेज खुलासा

इस पोस्ट का प्रिंटआउट निकाल आप अपने गाव अपने शहर अपने गली अपने मोहल्ले में फैलाइये और ब्राह्मणों के षड्यंत्रों को उजागर कीजिये ,
ब्राह्मण दिन रात हिन्दू हिन्दू क्यों चिल्लाते रहता है इसका एक सनसनीखेज खुलासा >>>
1) ब्राम्हण जात को पता है की, जब तक उसने ”हिन्दू” नाम की चादर, धर्म के नामपर ओढ़ी है, तब तक ही उसका वर्चस्व भारत पर है !!
2)क्योकि ब्राम्हण जानता है की बाभन ,बाभन के नाम पर गाव का ”प्रधान” भी नहीं हो सकता ,”हिन्दू” के नामपर ”प्रधानमन्त्री” ,और ”केन्द्रीय मंत्री” झट से बन जाता है !!
3)ब्राम्हण यह भी जनता है की जिस दिन यह ”हिन्दू” नामकी चादर खुल गयी कुत्ते की मौत मारा जाएगा ,
इसीलिए बाभन दिन रात ”हिन्दू हिन्दू हिन्दू” रटते रहता है,
४)जब की ब्राम्हण खुद यह जानता है की ,”हिंदू” नाम का कोई धर्म नही है …हिन्दू फ़ारसी का शब्द है ।
5)हिन्दू शब्द न तो वेद में है न पुराण में न उपनिषद में न आरण्यक में न रामायण में न ही महाभारत में ।
6)स्वयं ब्राह्मण जात ”दयानन्द सरस्वती” कबूल करते हैं कि यह मुगलों द्वारा दी गई गाली है ।
7)1875 में ब्राम्हण ”दयानन्द सरस्वती” ने ”आर्य समाज” की स्थापना की ”हिन्दू समाज” की नहीं । 8)अनपढ़ बाभन भी यह बात जानता है की बाभनो ने स्वयं को ”हिन्दू” कभी नहीं कहा। आज भी वे स्वयं को ”ब्राम्हण” ही कहते हैं, लेकिन सभी मूलनिवासी शूद्रों को हिन्दू कहते हैं ।
9)जब शिवाजी हिन्दू थे और मुगलों के विरोध में लड़ रहे थे तथा तथाकथित हिन्दू धर्म के रक्षक थे तब भी पूना के ब्राम्हणों ने उन्हें ”शूद्र” कह राजतिलक से इंकार कर दिया । घूस का लालच देकर ब्राम्हण गागाभट्ट को बनारस से बुलाया गया । गगाभट्ट ने “गागाभट्टी”लिखा उसमें उन्हें विदेशी राजपूतों का वंशज बताया तो गया लेकिन राजतिलक के दौरान मंत्र “पुराणों” के ही पढे गए वेदों के नहीं ।तो शिवाजी को ”हिन्दू” तब नहीं माना।
10) बाभनो ने मुगलों से कहा हम ”हिन्दू” नहीं हैं बल्कि, तुम्हारी तरह ही विदेशी हैं परिणामतः सारे हिंदुओं पर जज़िया लगाया गया लेकिन बाभनो को मुक्त रखा गया ।
11) 1920 में ब्रिटेन में वयस्क मताधिकार की चर्चा शुरू हुई ।ब्रिटेन में भी दलील दी गई कि वयस्क मताधिकार सिर्फ जमींदारों व करदाताओं को दिया जाए । लेकिन लोकतन्त्र की जीत हुई । वयस्क मताधिकार सभी को दिया गया । देर सबेर ब्रिटिश भारत में भी यही होना था । तिलक ने इसका विरोध किया । कहा ” तेली,तंबोली ,माली,कूणबटो को संसद में जाकर क्याहल चलाना है” । ब्राह्मणो ने सोचा यदि भारत में वयस्क मताधिकार यदि लागू हुआ तो अल्पसंख्यक ब्राम्हण मक्खी की तरह फेंक दिये जाएंगे । अल्पसंख्यक ब्राम्हण कभी भी बहुसंख्यक नहीं बन सकेंगे । सत्ता बहुसंख्यकों के हाथों में चली जाएगी । तब सभी ब्राह्मणों ने मिलकर 1922 में “हिन्दू महासभा” का गठन किया । 12)जो बाभन स्वयं हो हिन्दू मानने कहने को तैयार नहीं थे वयस्क मताधिकार से विवश हुये । परिणाम सामने है । भारत के प्रत्येक सत्ता के केंद्र पर बाभनो का कब्जा है ।
सरकार में बाभन ,विपक्ष में बाभन ,कम्युनिस्ट में ब्राम्हण,ममता ब्राम्हण ,जयललिता ब्राम्हण ,367 एमपी ब्राम्हणों के कब्जों में है ।
13) सर्वोच्च न्यायलयों में ब्राम्हणों का कब्जा,ब्यूरोक्रेसी में बाभनो का कब्जा,मीडिया,पुलिस ,मिलिटरी ,शिक्षा,आर्थिक सभी जगह बाभनो का कब्जा है ।
14) मतलब एक विदेशी गया तो दूसरा विदेशी सत्ता में आ गया । हम अंग्रेजों के पहले बाभनो के गुलाम थे अंग्रेजों के जाने के बाद भी ब्राम्हणों के गुलाम हैं । यही वह ”हिन्दू” शब्द है जो न तो वेद में है न पुराण में न उपनिषद में न आरण्यक में न रामायण में न ही महाभारत में । फिर भी ब्राह्मण हमें हिन्दू कहते हैं ,और हिन्दू की आड़ में अल्पसख्य बाभन बहुसंख्य बन भारत का कब्ज्जा कर लेते है !!!

यह रहा हिन्दू नाम की आड़ में विदेशी ब्राह्मणों के कब्ज्जे का सबुत ,

१)देश के 8676 मठों के मठाधीश
सवर्ण : 96 प्रतिशत
(इसमें ब्राह्मण 90 प्रतिशत)
ओबीसी : 4 प्रतिशत
एससी : 0 प्रतिशत
एसटी : 0 प्रतिशत
स्रोत : डेली मिरर,

२)प्रथम श्रेणी की सरकारी नौकरियों में जातियों का विवरण
सवर्ण : 76.8 प्रतिशत
ओबीसी : 6.9 प्रतिशत
एससी : 11.5 प्रतिशत
एसटी : 4.8 प्रतिशत
स्रोत : वी. नारायण स्वामी, राज्यमंत्री, प्रधानमंत्री कार्यालय, भारत सरकार द्वारा संसद में शरद यादव के एक प्रश्न का उत्तर देते हुए.

३)देश का कोई भी विश्वविद्यालय दुनिया के टॉप 200 में कहीं नहीं है. इन विश्वविद्यालयों में कुलपतियों का जातीय विवरण निम्न प्रकार से है:
सामान्य – 90 प्रतिशत
ओबीसी – 6.9 प्रतिशत
एससी – 3.1 प्रतिशत
एसटी – 0 प्रतिशत
स्रोत : डेली मिरर

४) हमारे शिक्षा संस्थानों में से एक भी दुनिया के टॉप 200 में कहीं नहीं है. केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में कुल 8852 शिक्षक कार्यरत हैं जिनमें विभिन्न वर्गों का प्रतिनिधित्व निम्न प्रकार है:
सवर्ण : 7771
ओबीसी : 1081
एससी : 568
एसटी : 268
स्रोत : RTI No. Estt./P10/69-2011/I.I.T. K267
Jan.29, 2011

~~भारतीय मीडिया तंत्र के मालिक और उनकी हकीकत
1=टाईम्स ऑफ इंडिया=जैन(बनिया)
2=हिंदुस्थान टाईम्स=बिर्ला(बनिया)
3=दि.हिंदू=अयंगार(ब्राम्हण)
4=इंडियन एक्सप्रेस=गोयंका(बनिया)
5=दैनिक जागरण=गुप्ता(बनिया)
6=दैनिक भास्कर=अग्रवाल(बनिया)
7=गुजरात समाचार=शहा(बनिया)
8=लोकमत =दर्डा(बनिया)
9=राजस्थान पत्रिका=कोठारी(बनिया)
10=नवभारत=जैन(बनिया)
11=अमर उजाला=माहेश्वरी(बनिया)

~~भारत सरकार के असली मलिक… वह कौन है… क्या यह सारी कंपनी, मिडिया (प्रिंट और टी.व्ही. चैनल्स) किसके पास है… क्या एस.सी., एस.टी., ओबीसी या मुसलमानो के पास मै है… कौन भ्रष्ट है?… यह पता चल जायेगा… कॉंग्रेस, बीजेपी या कम्युनिस्ट पार्टी पहले से ही ब्राम्हणो की है… उनको नीचे दिये गये लोग चलाते है…

१) एससी सिमेंट कंपनी=सुमित बैनर्जी(ब्राम्हण)
२) भेल=रविकुमार/कृष्णास्वामी(ब्राम्हण)
३) ग्रासिम हेंडालकी=कुमार मंगलम/बिर्ला(बनिया)
४) आयसीआयसी बँक=के.व्ही.कामत(ब्राम्हण)
५) जयप्रकाश असो.=योगेश गौर(ब्राम्हण)
६) एल. & टी.=एम.ए.नाईक (ब्राम्हण)
७) एनटीपीसी=आर.एस.शर्मा(ब्राम्हण )
८) रिलायन्स=मुकेश अंबानी(बनिया)
९) ओएनजीसी=आर.एस.शर्मा(ब्राम्हण)
१०) स्टेट बँक ऑफ इंडिया=ओपी भट(ब्राम्हण)
११) स्टर लाईट इंडस्ट्री=अनिल अग्रवाल(बनिया)
१२) सन फार्मा=दिलीप सिंघवी(ब्राम्हण)
१३) टाटा स्टील=बी.मथुरामन(ब्राम्हण)
१४) पंजाब नैशनल बँक=के. सी. चक्रवर्ती(ब्राम्हण)
१५) बँक ऑफ बडोदा=एम.डी.माल्या(ब्राम्हण)
१६) कैनरा बँक=ए.सी.महाजन(बनिया)
१७) इनफोसीस=क्रीज गोपालकृष्णन(ब्राम्हण)
१८) टीसीए=सुभ्रमन्यम रामदेसाई(ब्राम्हण)
१९) विप्रो=अजीम प्रेमजी(खोजा)
२०) किंगफिशर (विमान कंपनी)=विजय माल्या(ब्राम्हण)
२१) आयडीया=आदित्य बिर्ला(बनिया)
२२) जेट एअर वेज=नरेश गोयल(बनिया)
२३) एअर टेल=मित्तल (बनिया)
२४) रिलायन्स मोबाईल=अंबानी (बनिया)
२५) वोडाफोन=रोईया(बनिया)
२६) स्पाईस=मोदी(बनिया)
२७) बि.एस.एन.एल.=कुलदीप गोयल(बनिया)
२८) टी.टी.एम.एल.=के.ए.चौकर(ब्राम्हण),,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,इन ब्राह्मण के फेंके जाल में मत फसिये
पढ़िए और परिक्षण कर के जानिए. आरएसएस
राष्ट्रवादी या जातिवादी? महाराष्ट्र के कुछ
पुरातनपंथी ब्राह्मणों द्वारा स्थापित करके
विक्सित किया गया संघ(आरएसएस)
राष्ट्रवादी है या जातिवादी ?
इसका परिक्षण 2004 के राष्ट्रिय स्तर के संघ के
पदाधिकारियो के नीचे वर्णित विवरण में दिए
गए नामो में से देश के भिन्न-भिन्न सामाजिक
समूहों का कितना प्रतिनिधित्व है,
उनका विश्लेषण करने से हो सकता है. क्रम – – पद – –

  • – – – – – नाम – – – – – – – वर्ण
  1. सरसंघचालक – – – – के.एस.सुदर्शन – – – – –
    ब्राह्मण
  2. सरकार्यवाह – – – – – मोहनराव भागवत – –
    ब्राह्मण
  3. सह सरकार्यवाह – – – मदनदास. – – – – – – –
    ब्राह्मण
  4. सह सरकार्यवाह – – – सुरेश जोशी – – – – – –
    ब्राह्मण
  5. सह सरकार्यवाह – – – सुरेश सोनी – – – – – –
    वैश्य

06.शारिरीक प्रमुख – – – उमाराव पारडीकर – –
ब्राह्मण

  1. सह शारीरिक प्रमुख – के.सी.कन्नान – – – – –
    वैश्य

08.बौध्धिक प्रमुख – – – -रंगा हर – – – – – – – –
ब्राह्मण

  1. सह बौध्धिक प्रमुख – -मधुभाई कुलकर्णी -….ब्राह्मण
  2. सह बौध्धिक प्रमुख – -दत्तात्रेय होलबोले – –
    -ब्राह्मण
  3. प्रचार प्रमुख – – – – – श्रीकान्त जोशी – – –
  • ब्राह्मण
  1. सह प्रचार प्रमुख – – – अधिश कुमार – – – – –
    ब्राह्मण
  2. प्रचारक प्रमुख – – – – एस,वी. शेषाद्री – – – –
    ब्राह्मण
  3. सह प्रचारक प्रमुख – – श्रीकृष्ण मोतिलाग – –
    ब्राह्मण
  4. सह प्रचारक प्रमुख – – सुरेशराव केतकर – – –
    ब्राह्मण
  5. प्रवक्ता – – – – – – – -राम माधव – – – – – –
    ब्राह्मण
  6. सेवा प्रमुख – – – – – -प्रेरेमचंद गोयेल – – – –
    वैश्य

18.सह सेवा प्रमुख – – – -सीताराम केदलिया – –
वैश्य

19.सह सेवा प्रमुख – – – -सुरेन्द्रसिंह चौहाण – – –
क्षत्रिय

  1. सह सेवा प्रमुख – – – -ओमप्रकाश- – – – – – –
    ब्राह्मण
  2. व्यवस्था प्रमुख – – – -साकलचंद बागरेचा – –
    वैश्य

22.सहव्यवस्था प्रमुख – – बालकृष्ण त्रिपाठी – –
-ब्राह्मण

  1. संपर्क प्रमुख – – – – – हस्तीमल – – – – – – – –
    वैश्य

24.सह संपर्क प्रमुख – – – इन्द्रेश कुमार- – – – – –
ब्राह्मण

  1. सभ्य- – – – – – – – – राघवेन्द्र कुलकर्णी – – –
    ब्राह्मण
  2. सभ्य – – – – – – – – -एम.जी. वैद्य – – – – – –
    ब्राह्मण
  3. सभ्य – – – – – – – – -अशोक कुकडे- – – – – -शुद्र
  4. सभ्य – – – – – – – – -सदानंद सप्रे- – – – – – –
    ब्राह्मण
  5. सभ्य – – – – – – – – -कालिदास बासु – – – – –
    ब्राह्मण
  6. विशेष आमंत्रित – – – सूर्य नारायण राव – – –
    ब्राह्मण
  7. विशेष आमंत्रित – – – श्रीपति शास्त्री – – –
  • – ब्राह्मण 32. विशेष आमंत्रित – – – वसंत बापट –
  • – – – – ब्राह्मण
  1. विशेष आमंत्रित – – – बजरंगलाल गुप्ता – – – –
    वैश्य (स्त्रोत-आरएसएस डॉटकॉम इंटरनेट पर
    आधारित-2004)
    अखिल भारतीय स्तर पर सर संघचालक के.एस.सुदर्शन
    सहित 24 ब्राह्मण यानी 72.73%, 7 वैश्य
    यानी 21.21%, 1 क्षत्रिय
    यानी 3.03% और 1 शुद्र यानी 3.03%
    प्रतिनिधित्व देखने को मिलता है. ब्राह्मण और
    वैश्य जैसी उच्चवर्ग जातियो का 93.04%
    प्रतिनिधित्व है. 5% विक्सित शुद्र और 45%
    पिछड़े शुद्र(ओबीसी) तथा 24% एससी-
    एसटी जातियों को मिला कर 75%
    आबादी का 1 यानी सिर्फ 3.03%
    ही प्रतिनिधित्व है.एससी-
    एसटी जातियों का कोई प्रतिनिधित्व
    ही नहीं है. ऊपर का ये चित्र ब्राह्मण जातिवाद
    के नंगे नाच का चित्र है. संघ के
    जातिवादी ब्राह्मण नेताओ ने भारत को 11
    क्षेत्रों में बांट कर अपने जाति संगठन को आरएसएस
    के नाम से जमाया है. इन क्षेत्रो का संचालन करने
    वालो का सामाजिक चित्र नीचे
    दिया गया है.
    11 क्षेत्रोके 34 पदाधिकारियों में सामाजिक
    प्रतिनिधित्व
    सामाजिकवर्ग – – – – आबादी – – –
    पदाधिकारी – हिस्सेदारी
  2. ब्राह्मण – – – – – -03.00% – – – 24 – –
  • – 70.59%
  1. क्षत्रिय-भूमिहार – 05.90% – – – 01
  • – – – 02.94%
  1. वैश्य – – – – – – -01.70% – – – 07 – – – –
    20.55%
  2. शुद्र – – – – – – – 51.70%- – – – 01 – – –
  • 05.88%
  1. अतिशुद्र- – – – – 24.00% – – – -00 – –
  • – 00.00%
    (स्त्रोत-आरएसएस डॉटकॉम 2004- इंटरनेट पर
    आधारित)
    केवल अखिल भारतीय संघ
    ही नहीं परन्तु 11 क्षेत्रोंमें बंटा हुए आरएसएस
    का क्षेत्रीय नेतृत्व भी ब्राह्मण नेताओ के
    नियंत्रण में है. 11 क्षेत्रोके 34 पदाधिकरियोमे
    ब्राह्मणों का प्रतिनिधित्व 70.59% है,
    जबकि वैश्य 20.59% है.
    निम्न वर्गोमे शुद्र- अतिशुद्रो की 75%
    आबादी का पदाधिकरियोमे प्रतिनिधित्व
    सिर्फ 5.88% ही है. अतिशुद्र मानी गई एससी-
    एसटी जातियों की 24%
    जनसंख्या का तो कोई प्रतिनिधित्व ही नहीं है.
    ऊपर का चित्र देखने के बाद कोई भी व्यक्ति कह
    सकता है की, संघ और संघ द्वारा खड़े किये गए
    संगठनो का नियंत्रण ब्राह्मण जाति के हाथ में है.
    संघ ढोंगी हिन्दुवादी, पाखंडी राष्ट्रवादी और
    असली जातिवादी है.
    जैसा परिक्षण तिन ब्राह्मण सरसंघचालको के
    जीवनवृतो में से हो सकता है वैसा ही परिक्षण
    1998-2004 के दौरान केन्द्र सरकार के
    प्रधानमन्त्री रहे संघ के कट्टर
    जातिवादी ब्राह्मण प्रचारक
    अटलबिहारी वाजपेयी के व्यवहार से भी स्पष्ट
    हो सकता है. वाजपेयी शासन मे
    ब्राह्मणों को क्या मिला और
    गैरब्राह्मणों को क्या मिला? गैर- ब्राह्मणों में
    शुद्र-अतिशुद्र(75%) को क्या मिला? केबिनेट और
    नियुक्ति में कितनी सामाजिक
    हिस्सेदारी मिली? – वाजपेयी शासनमे
    ब्राह्मणों का प्रतिनिधित्व 1998 – 2004
    क्रम – – – – पद – – – – – – – – – – – -कुल – – ब्राह्मण
  • हिस्सेदारी
  1. – केन्द्रीय केबिनेटमंत्री – – – – – – –19 – – 10 –
  • – – 53%
  1. – राज्य तथा उपमंत्री – – – – – – – -49 – – 34 –
  • – – 70%
  1. – सचीव-उपसचिव-सयुंक्तसचिव – 500 – -340 – –
  • -62%
  1. – राज्यपाल-उपराज्यपाल- – – – – -27 – – -13 –
  • – -48%
  1. – पब्लिक सेक्टर के चीफ – – – – – 158 – – 91 – – –
    -58%
    ये सभी ऐसे पद है जिसकी नियुक्ति केन्द्र सरकार के प्रधानमन्त्री के रूपमे वाजपेयी निर्णय करते थे. 3.5% ब्राह्मण की स्थिति क्या है और 96.5% गैरब्राह्मण की क्या स्थिति है? 75% शुद्र- अतिशुद्रो (obc SC ST) को कितना प्रतिनिधित्व
    मिला होगा ?
    भारत में मूलनिवासियो को न्याय नहीं मिलता क्योकि न्यायपालिका पर विदेशी ब्राह्मण-बनियों का कब्ज्जा है !!
    यह रहा सबूत =
    करिया मुंडा रिपोर्ट – 2000
    18 राज्यों की हाईकोर्ट में OBC SC ST जजों की संख्या
    1) दिल्ली – कुल जज 27
    (विदेशी ब्राह्मण-बनिया-27 जज ,ओबीसी – 0 जज SC- 0 जज ,ST- 0 जज )

2) पटना – कुल जज 32 (विदेशी ब्राह्मण-बनिया-32 जज ,ओबीसी – 0 जज SC- 0 जज ,ST- 0 जज )

3) इलाहाबाद – कुल जज 49 ( (विदेशी ब्राह्मण-बनिया-47 जज ,ओबीसी – 1 जज SC- 1 जज ,ST- 0 जज )

4) आंध्रप्रदेश – कुल जज 31 (विदेशी ब्राह्मण-बनिया-25 जज ,ओबीसी – 4 जज SC- 0 जज ,ST- 2 जज )

5)गुवाहाटी – कुल जज 15 (विदेशी ब्राह्मण-बनिया-12 जज ,ओबीसी – 1 जज SC- 0 जज ,ST- 2 जज )

६) गुजरात -कुल जज 33 (विदेशी ब्राह्मण-बनिया-30 जज ,ओबीसी – 2 जज SC- 1 जज ,ST- 0 जज )

7)केरल -कुल जज 24 (विदेशी ब्राह्मण-बनिया- 13 जज ,ओबीसी – 9 जज SC- 2 जज ,ST- 0 जज )

8) चेन्नई -कुल जज 36 (विदेशी ब्राह्मण-बनिया- 17 जज ,ओबीसी -16 जज SC- 3 जज ,ST- 0 जज )

9) जम्मू कश्मीर -कुल जज 12 (विदेशी ब्राह्मण-बनिया-

11 जज ,ओबीसी – जज SC- जज ,ST- 1 जज )

10) कर्णाटक -कुल जज 34 (विदेशी ब्राह्मण-बनिया- जज 32 ,ओबीसी – जज SC- 2 जज ,ST- जज )

11) ओरिसा कुल -13 जज (विदेशी ब्राह्मण-बनिया- 12 जज ,ओबीसी – 0 जज SC- 1 जज ,ST- 0 जज )

12) पंजाब- हरियाणा -कुल 26 जज (विदेशी ब्राह्मण-बनिया- 24 जज ,ओबीसी – 0 जज SC- 2 जज ,ST- 0 जज )

13)कलकत्ता – कुल जज 37 (विदेशी ब्राह्मण-बनिया- 37 जज ,ओबीसी -0 जज SC- 0 जज ,ST- 0 जज )

१४) हिमांचल प्रदेश -कुल जज 6 (विदेशी ब्राह्मण-बनिया- 6 जज ,ओबीसी – 0 जज SC- 0 जज ,ST- 0 जज )

15)राजस्थान -कुल जज 24 (विदेशी ब्राह्मण-बनिया- 24 जज ,ओबीसी – 0 जज SC- 0 जज ,ST- 0 जज )

16)मध्यप्रदेश -कुल जज 30 (विदेशी ब्राह्मण-बनिया- 30 जज ,ओबीसी – 0 जज SC- 0 जज ,ST- 0 जज )

17)सिक्किम -कुल जज 2 (विदेशी ब्राह्मण-बनिया- 2 जज ,ओबीसी – 0 जज SC- 0 जज ,ST- 0 जज )

18)मुंबई -कुल जज 50 (विदेशी ब्राह्मण-बनिया- 45 जज ,ओबीसी – 3 जज SC- 2 जज ,ST- 0 जज )
कुल TOTAL= 481 जज में से ,विदेशी ब्राह्मण-बनिया 426 जज , ओबीसी जात के 35 जज ,SC जात के 15 जज ,ST जात के 5 जज
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डॉ सुनील अहीर।
…पूरा षड्यंत्र सुनने की लिए वीडियो देखें, पैरोंतले जमीन खिसक जाएगी। 🙏🌹🙏

यांत्रिक युग में ध्यान ज्यादा जरूरी है

ध्यान का अर्थ होता है अखंड हो जाओ; एक चैतन्य हो जाओ। और उस एक चैतन्य के लिए जरूरी है कि तुम अपने जीवन से यांत्रिकता छोड़ो। यंत्र तो नहीं छोड़े जा सकते, यह पक्का है। अब कोई उपाय नहीं है। अब लौटने की कोई जगह नहीं है। अब तुम चाहो लाख कि हवाई जहाज न हो, लोग फिर बैलगाड़ी में चलें—यह नहीं होगा। अब तुम लाख चाहो कि रेडियो न हो, यह नहीं होगा। अब तुम लाख चाहो कि बिजली न हो, यह नहीं होगा। होना भी नहीं चाहिए। लेकिन मनुष्य यांत्रिक न हो, यह हो सकता है। 

और अब तक तो खतरा न था, अब खतरा पैदा हुआ है। यंत्रों से बुद्ध के जमाने का आदमी नहीं घिरा था, तो भी बुद्ध ने अमूर्च्छा सिखायी है, विवेक सिखाया है, जागृति सिखायी है, होश सिखाया है। और आज तो और अड़चन बहुत हो गई है। आज तो एक ही बात सिखाई जानी चाहिए—मूर्च्छा छोड़ो, होशपूर्वक जियो। जो भी करो, इतनी सजगता से करो कि तुम्हारा कृत्य मशीन का कृत्य न हो। तुम में और मशीन में इतना ही फर्क है अब कि तुम होशपूर्वक करोगे, मशीन का किसी होश की जरूरत नहीं है। अगर तुम में भी होश नहीं है तो तुम भी मशीन हो।

पुराने समय के ज्ञानियों ने मनुष्य को चौंकाया था, बार—बार एक बात कही थी, कल दरिया ने भी कही—कि देखो, आदमी रहना,पशु मत हो जाना! आज खतरा और बड़ा हो गया है। आज खतरा है कि देखो, देखा आदमी रहना, यंत्र मत हो जाना। यह पशुओं से भी ज्यादा बड़ा पतन है। क्योंकि पशु फिर भी जीवंत हैं। पशु फिर भी यंत्र नहीं हैं। बुद्धों ने नहीं कहा है कि यंत्र मत हो जाना, क्योंकि यंत्र नहीं थे। 

लेकिन मैं तुमसे कहना चाहता हूं कि खतरा बहुत बढ़ गया है। खाई और गहरी हो गई है। पहले पुराने जमाने में गिरते तुम तो बहुत से बहुत पशु हो जाते, लेकिन अब गिरोगे तो यंत्र हो जाओगे। और यंत्र से नीचे गिरने का और कोई उपाय नहीं है। और यंत्र से बचने की ही औषधि है: जागे हुए जीयो। चलो तो होशपूर्वक बैठो तो होशपूर्वक, सुनो तो होशपूर्वक, बोलो तो होशपूर्वक। चौबीस घंट जितना बन सके उतना होश साधो। हर काम होशपूर्वक करो। छोटे—छोटे काम, क्योंकि सवाल काम का नहीं है। सवाल तो होश के लिए नए—नए अवसर खोजने का है। स्नान कर रहे हो, और तो कुछ काम नहीं है, होशपूर्वक ही करो। फव्वारे के नीचे बैठे हो; होशपूर्वक, जागे हुए, एक—एक बूंद को अनुभव करते हुए बैठा। भोजन कर रहे हो, जागे हुए।

लोग कहां भोजन कर रहे हैं जागे हुए! गटके जाते हैं। न स्वाद का पता है, न चबाने का पता है, न पचाने का पता है—गटके जाते हैं। पानी भी पीते हैं तो गटक गए। उसकी शीतलता भी अनुभव करो। तृप्त होती हुई प्यास भी अनुभव करो। तो तुम्हारे भीतर यह अनुभव करने वाला धीरे—धीरे सघन होगा, केंद्रीभूत होगा। और तुम जागकर जीने लगो, तो फिर हो जाए जगत, यंत्र से भरा जाए कितना ही, तुम्हारा परमात्मा से संबंध नहीं टूटेगा।

जागरण या ध्यान परमात्मा और तुम्हारे बीच सेतु है। और जितना तुम्हारे जीवन में ध्यान होगा, उतना ही तुम्हारे जीवन में प्रेम होगा। क्योंकि प्रेम ध्यान का परिणाम है। या इससे इल्टा भी हो सकता है: जितना तुम्हारे जीवन में प्रेम होगा; उतना ध्यान होगा।

यंत्र दो काम नहीं कर सकते—
ध्यान नहीं कर सकते और प्रेम नहीं कर सकते। बस इन दो बातों में ही मनुष्य की गरिमा है, महिमा है, महत्ता है, उसकी भगवत्ता है। इन दो को साध लो, सब सध जाएगा। और दोनों को इकट्ठा साधने की भी जरूरत नहीं है; इनमें से एक साध लो, दूसरा अपने-आप सध जाएगा।

  • ओशो , 🌷
    अमी झरत बिसगत कँवल