मध्य प्रदेश कांग्रेस के पास शिवराज को हराने का सुनहरा मौका

मध्य प्रदेश कांग्रेस के पास शिवराज को हराने का सुनहरा मौका

मध्य प्रदेश में पिछले 15 साल से कांग्रेस सत्ता से बाहर है. ऐसे में पार्टी के लिए आगामी विधानसभा चुनाव किसी सेमीफाइनल मुकाबले की तरह है. लिहाजा कांग्रेस ने इस बार जीत के लिए पूरी ताकत झोंक दी है.

हाल के दिनों में कई ओपिनियन पोल ने इस बात के संकेत दिए हैं कि चुनाव में पलड़ा कांग्रेस का भारी रहेगा. लगातार पिछले तीन बार से शिवराज सिंह चौहान प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं. ऐसे में कांग्रेस को पूरी उम्मीद है कि एंटी इनक्बेंसी फैक्टर से भी उन्हें फायदा मिलेगा.

मध्य प्रदेश में कांग्रेस के पिछले प्रदर्शन पर नज़र डालें तो सत्ता में उनकी वापसी आसान नहीं होगी. साल 2003 के चुनाव में कांग्रेस को 37 सीटों पर जीत मिली थी. साल 2008 के चुनाव में ये आंकड़ा 71 का था. लेकिन पिछली बार यानी साल 2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को सिर्फ 58 सीटों पर जीत मिली थी.

मध्य प्रदेश में विधानसभा की कुल 230 सीटें हैं. पिछले तीन चुनाव में बीजेपी को धमाकेदार जीत मिली है. साल 2003 में बीजेपी को 173 सीटें मिली थी. साल 2008 के चुनाव में बीजेपी के खाते में 143 सीटें आई थी. जबकि पिछली बार यानी 2013 के चुनाव में बीजेपी ने 165 सीटों पर धमाकेदार जीत दर्ज की थी.

कांग्रेस को ये अच्छी तरह पता है कि इस बार भी अगर हार हुई तो फिर पार्टी कैडर पर गंभीर सवाल खड़े होंगे. कांग्रेस ने अपने मेनिफेस्टो में हर क्षेत्र में सुधार का वादा किया है. बाक़ी राज्यों के मुकाबले यहां कांग्रेस के लिए हालात थोड़े अलग हैं. यहां दूसरे राज्यों की तरह कांग्रेस के पास बड़े और अनुभवी नेताओं की कोई कमी नहीं है. राज्य के लगभग हर क्षेत्र से पार्टी के पास बड़ा नेता मौजूद है.

पार्टी के सबसे अनुभवी नेता दिग्विजय सिंह सबसे लोकप्रिय नेता है. कमलनाथ का महाकौशल क्षेत्र में दबदबा है. जबकि ज्योतिरादित्य सिंधिया को ग्वालियर और चंबल इलाके से भारी समर्थन मिलता है. इसके अलावा अजय सिंह, सुरेश पचौरी, अरुण यादव और कांतिलाल भूरिया का भी अपने-अपने क्षेत्रों में भारी दबदबा है.

सच कहा जाए तो कांग्रेस के लिए एक नेता चुनना आसान नहीं होगा. जाहिर है पार्टी में एक से बढ़ कर एक चेहरे होने के चलते बीच-बीच में नेताओं के बीच सीट बंटवारे को लेकर मनमुटाव की भी खबरें आती रहती है.

पार्टी के कई नेता एकजुटता की बातें तो करते हैं लेकिन फिर से बंद कमरे से बीच-बीच में मनमुटाव की खबरें बाहर आती रहती है. खास कर दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच अनबन की खबरें तो जगजाहिर हैं.

दूसरी तरफ बीजेपी के खेमे में भी इस बार सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है. संभवत: इस बार पार्टी बेहद बुरे दौर से गुजर रही है. हाल के दिनों में पार्टी के कई बड़े नेता विवादों में रहे हैं. पेड न्यूज़ मामले में नरोत्तम मिश्रा का नाम उछला था. विधायक मलखान सिंह मर्डर केस में लाल सिंह आर्य का नाम आया था. सुरेन्द्र पटवा का नाम लोन केस में आया था. इसके अलावा रामपाल सिंह की बहु ने तथाकथित आत्महत्या की थी.

इसके अलावा टिकट बंटवारे को लेकर पार्टी के दूसरे बड़े नेता बाबूलाल गौड़, सरतात सिंह और कुसुम महदेले ने भी बीजेपी को शर्मिंदा किया. दूसरी तरफ कांग्रेस ने सीट बंटवारे को लेकर क्षेत्रीय और सामाजिक समीकरण दोनों का ख्याल रखा. हालांकि कांग्रेस पार्टी मयावती की बीएसपी से गठबंधन नहीं कर सकी. पिछली बार मायावती की पार्टी को 6.5 फीसदी वोट मिले थे.

कई बार शिवराज सिंह चौहान का नाम विवादों में आया है. लेकिन इसके बावजूद भी वे लगातार गद्दी पर काबिज़ हैं. खास बात ये है कि एक बार फिर से वे हर किसी के लिए कड़ी चुनौती पेश कर रहे हैं.

साभार: विवेक त्रिवेदी, न्यूज़ १८ हिंदी

एमनेस्टी इंंटरनेशनल ने आंग सान सू ची से सर्वोच्च सम्मान लिया वापस

एमनेस्टी इंंटरनेशनल ने आंग सान सू ची से सर्वोच्च सम्मान लिया वापस

एमनेस्टी इंंटरनेशनल ने आंग सान सू ची से सर्वोच्च सम्मान लिया वापस आंग सान सू ची

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने सोमवार को आंग सान सू ची से अपना सर्वोच्च सम्मान वापस ले लिया. इसके पीछे कारण बताया गया कि रोहिंग्या मुस्लिमों के खिलाफ म्यामांर की सेना द्वारा किए गए अत्याचारों पर उन्होंने उदासीन रुख अपनाया था.

लंदन स्थित वैश्विक मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने कहा कि 2009 में सू ची को दिया गया ‘‘ऐम्बैसडर आफ कॉन्शन्स अवार्ड’’ वापस ले रहा है. उस वक्त सू ची घर में नज़रबंद थीं.

एमनेस्टी द्वारा जारी एमनेस्टी इंटरनेशनल प्रमुख कूमी नायडू द्वारा लिखे खत में कहा गया है, ‘‘आज हम काफी निराश हैं कि आप अब आशा, साहस और मानवाधिकारों के रक्षा की प्रतीक नहीं हैं.’’ एमनेस्टी इंटरनेशनल ने कहा कि उसने अपने फैसले के बारे में सू ची को रविवार को ही सूचित कर दिया था. सू ची ने इस बारे में अब तक कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं दी है.

बता दें कि इससे पहले रोह‍िंग्‍या मुसलमानों का दर्द नहीं समझने पर प्रसिद्ध मानवाधिकार कार्यकर्ता आंग सान सू की से ऑक्सफोर्ड अवॉर्ड वापस ले लिया गया था.

यह अवॉर्ड सू की को 1997 में सर्वसम्मति से यह अवॉर्ड दिया गया था. उस वक्त ऑक्सफोर्ड सिटी काउंसिल ने इस अवॉर्ड को स्थायी रूप से हटाने के लिए वोट किया था. काउंसिल ने कहा था, ‘जो हिंसा को लेकर अपनी आंखें मूंद लेते हैं, उन्हें यह पुरस्कार नहीं दिया जा सकता.’

साभार: भाषा

यूपी: इलाहाबाद-फैजाबाद के बाद इन जगहों के नाम बदलने की हो रही तैयारी, अलीगढ़-आजमगढ़ शामिल

यूपी: इलाहाबाद-फैजाबाद के बाद इन जगहों के नाम बदलने की हो रही तैयारी, अलीगढ़-आजमगढ़ शामिल

इलाहाबाद और फैजाबाद का नाम बदलने के बाद अब प्रदेश सरकार आजमगढ़, कानपुर और अलीगढ़ के नाम बदल सकती है। इस संबंध में राजस्व विभाग ने तैयारी शुरू कर दी है। हालांकि अधिकारी इस संबंध में अभी कुछ कहने को तैयार नहीं हैं लेकिन सूत्रों का दावा है कि जल्द ही इस आशय के कैबिनेट प्रस्ताव को मंजूरी देकर नाम बदले जा सकते हैं।

अलीगढ़ हो सकता है हरिगढ़
अलीगढ़ का नाम हरिगढ़ किया जा सकता है जबकि आजमगढ़ का नाम आर्यमगढ़ करने का प्रस्ताव तैयार हो रहा है। असल में अलीगढ़ का नाम बदले जाने की मांग खासी पुरानी है। विश्व हिन्दू परिषद ने वर्ष 2015 में अलीगढ़ में प्रस्ताव पास कर कहा था कि अलीगढ़ का प्राचीन नाम हरिगढ़ ही है। इसे बाद में अलीगढ़ कर दिया गया। इसलिए इसे अलीगढ़ को हरिगढ़ किया जाना चाहिए। सूत्र बताते हैं कि प्रदेश सरकार इसका नाम बदलने की तैयारी में है। वैसे भी देश व यूपी की सियासत में इस जिले व शहर की अपनी अहमियत रही है। कल्याण सिंह ने 1992 में मुख्यमंत्री रहते हुए इसका नाम हरिगढ़ करने कोशिश की थी लेकिन थी लेकिन उस वक्त केंद्र में कांग्रेस सरकार थी, इसलिए उनकी कोशिशें परवान नहीं चढ़ सकीं।

आजमगढ़ यानी आर्यमगढ़
पूर्वांचल में बहुसंख्यक वोटरों को साधने के लिए आजमगढ़ का नाम भी बदलने पर विचार चल रहा है। इसे आर्यमगढ़ करने की मांग काफी पुरानी है। सांसद के तौर पर योगी आदित्यनाथ अपनी जनसभाओं में आजमगढ़ को आर्यमगढ़ कहते रहे हैं।

मुजफ्फरनगर व आगरा के नाम बदलने की मांग

अब ताजा विवाद मुजफ्फरनगर व आगरा के नाम पर खड़ा हो गया है। भाजपा विधायक संगीत सोम ने मुजफ्फरनगर का नाम बदलकर लक्ष्मीनगर करने की मांग की है। आगरा उत्तरी के विधायक जगन प्रसाद गर्ग ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर आगरा का नाम बदलकर अग्रवन करने की मांग की है।

गरमा रही है सियासत

विपक्षी दलों के नाम बदलने की कवायद पर आरोप लगाने के चलते सियासत एक बार फिर गरमा गई है। इलाहाबाद व फैजाबाद जिले का नाम बदले जाने के बाद खुद सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के विधायक ही अब और कई जिलों के नाम बदलने की मांग करने लगे हैं। मुजफ्फरनगर व आगरा का नाम बदलने की मांग औपचारिक रूप से सामने भी आ चुकी है।

संस्कृति बनाम सांप्रदायिकता
प्रमुख हिन्दू तीर्थस्थलों के रूप में प्रतिष्ठित इन दोनों स्थानों को हिन्दुत्व की पहचान वाला नाम देने के पीछे प्रदेश सरकार की मंशा है कि भारतीय प्राचीन संस्कृति का संरक्षण किया जा सके। विश्व हिन्दू परिषद और भाजपा के सहयोगी संगठन आरोप लगाते रहे हैं कि विदेशी आक्रमणकारियों ने जबरन पुराने नामों को बदला है। लिहाजा केंद्र व राज्य में भाजपा शासन होने के चलते अब नाम बदले जाने चाहिए।

इरफान हबीब ने किया विरोध
इन सभी नई मांगों का विरोध भी शुरू हो गया है। मशहूर इतिहासविद इरफान हबीब ने मुजफ्फरनगर का नाम बदले जाने की मांग का पुरजोर विरोध किया है। उन्होंने ट्वीट कर कहा है कि यह मांग सांप्रदायिक है। सन 1633 में शाहजहां के शासनकाल में सैयद मुजफ्फरनगर खान ने मुजफ्फनगर जिले की स्थापना की थी। उनका यह भी कहना है कि जिले का नाम बदलने की मांग करने वाले संगीत सोम दंगों के आरोपी हैं।

पहले भी बदले हैं नाम
नाम बदलने का एजेंडा यूपी में नया नहीं है। भाजपा सरकार ने मुगलसराय स्टेशन का नाम एकात्म मानववाद के प्रणेता दीनयदयाल उपाध्याय के नाम कर दिया। इसके बाद बरेली एयरपोर्ट (नाथनगरी), गोरखपुर (महायोगी गोरखनाथ) व आगरा एयरपोर्ट (दीनदयाल उपाध्याय एयरपोर्ट)के नाम बदलने का प्रस्ताव कैबिनेट ने पास कर केंद्र सरकार के नागरिक उड्डयन मंत्रालय को भेजा है। सीएम योगी आदित्यनाथ ने पिछले साल कानपुर के पनकी स्टेशन का नाम पनकी धाम कर दिया था।

पुराना है नाम बदलने का चलन
मायावती ने अपने अलग-अलग कार्यकाल में नए जिले बनाकर उनका नामकरण दलित व पिछड़े वर्ग से जुड़े संतों व महापुरुषों के नाम पर किया था। उस वक्त भाजपा ने इसका विरोध किया था।
-मायावती ने एटा से काटकर बनाए जिले कासगंज का नाम कांशीराम नगर किया था।
-अमेठी को जिला बना कर छत्रपतिशाहूजी नगर नाम दिया था
-अमरोहा का नाम ज्योतिबा फुले नगर किया
-हाथरस का नाम महामाया नगर तो कई बार बदला।
-बसपा राज में ही कानपुर देहात का नाम रमाबाई नगर
-संभल का नाम भीमनगर
-शामली का नाम प्रबुद्धनगर
-हापुड़ का नाम पंचशील नगर कर दिया।

सपा भी पीछे नहीं
2012 में अखिलेश यादव सीएम बने तो उन्होंने जुलाई में नए जिले तो बरकरार रखे लेकिन नए नाम के बजाय पुराने नाम बहाल कर दिए। मायावती ने सख्त एतराज जताते हुए इसे महापुरुषों का अपमान बताया।

वरिष्ठ पत्रकार एसपी यादव बने दबंग दुनिया मुंबई के नए संपादक

एसपी यादव

वरिष्ठ पत्रकार एसपी यादव बने दबंग दुनिया मुंबई के नए संपादक

मुंबई से निकलने वाले प्रमुख हिंदी दैनिक ‘दबंग दुनिया’ के सम्पादकीय विभाग में बड़ा फेरबदल हुआ है. दबंग दुनिया में स्थानीय संपादक का इस्तीफा हो गया है और उनकी जगह एसपी यादव को लाया गया है. पत्रकारिता जगत में एसपी यादव किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं, पत्रकारिता, लेखन और साहित्य के क्षेत्र वह एक जाना माना नाम हैं.

अपने सधे हुए लेखन के धनी एसपी यादव ने अपनी प्राथमिक शिक्षा सेंट जेवियर स्कूल और एल्फिंस्टन कॉलेज मुंबई से उच्च शिक्षा प्राप्त की. पिछले साल कुछ समय के लिए उन्होंने जयपुर के भास्कर में भी काम किया है. भास्कर जयपुर जाने से पहले एसपी यादव दबंग दुनिया में ही थे. लेकिन मुंबई में अपने घर से दूर जयपुर उनको रास नहीं आया और जल्दी ही वह वापस आ गए. उसके बाद वह नेटफ्लिक्स और कुछ प्रकाशनों के लिए हिंदी-अंग्रेजी-मराठी अनुवाद के कार्य में भी व्यस्त थे.

एसपी यादव ने पत्रकारिता की शुरूआत नब्बे के दशक में गोरेगांव से प्रकाशित एक छोटे से अख़बार ईगल टाइम्स से की. उसके बाद वह कई पत्र पत्रिकाओं में विभिन्न पदों पर रहे. मसलन, अपने समय के चर्चित टेबलायड ‘दो बजे दोपहर’ में वह लम्बे समय तक डेस्क पर रहे. ‘स्वस्थ्य सुख’ पत्रिका में कार्यकारी संपादक, हिंदी दैनिक ‘विविध समाचार’ में स्थानीय संपादक, ‘मुंबई मित्र’, ‘वृत मित्र’, ‘मुंबई मेट्रो’ और ‘हमारा महानगर’ में वरिष्ठ सहायक संपादक रहे. लेकिन हिंदी पत्रकारिता में पगार से घर चलना बेहद मुश्किल काम है यही वजह है कि एसपी यादव देश नामी प्रकाशन समूहों के लिए फ्रीलान्स लिखते भी करते रहे .

‘हमारा महानगर’ के बाद ‘दबंग दुनिया’ में वह पहले समाचार संपादक और बाद में कुछ समय के लिए संपादक भी बने, बाद में वरिष्ठ पत्रकार नीलकंठ पारटकर ने उनका स्थान ग्रहण किया, कुछ समय बाद उन्होंने दबंग अखबार ही छोड़ दिया और प्रमोट होकर जयपुर भास्कर में चले गए, जहाँ उन्होंने सहायक फीचर संपादक जैसे शानदार पद पर सफलता पूर्वक काम किया. फिलहाल उन्होंने दबंग दुनिया में बतौर स्थानीय संपादक अपना कार्यभार संभाल लिया है.

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