पहले स्वतन्त्रता संग्राम का साक्षी बुंदेलखंड आज फिर महासमर की राह पर

बुलंद बुंदेलखंड सीरीज पार्ट-1 पहले स्वतन्त्रता संग्राम का साक्षी बुंदेलखंड आज फिर महासमर की राह पर गाँव किल्हौवा, जिला महोबा के प्रवेश द्वार पर मौजूद बदलते दौर का साक्षी लगभग शतक पुराना यह पीपल का पेड़ समय के अनेक उतार चढ़ाव देख चुका है पहले स्वतन्त्रता संग्राम का साक्षी बुंदेलखंड आज फिर महासमर की राह पर दोस्तों, हम “बुलंद बुंदेलखंड” शीर्षक से एक कॉलम की शुरूआत कर रहे हैं जिसमें देश के गाँव, देहात और शहरों में रह रहे लोगों के जीवन से जुड़े मसले, मुद्दे, समस्याएं व मुश्किलात शामिल किये जाएंगे। इस पर आपके विचार, सुझाव, समस्याएं और प्रतिक्रियाएं आमंत्रित हैं। आप अपनी समस्या यदि कोई हो तो हमें लिखकर भेजें हम उसे भी इसमें शामिल करेंगे। हाँ, हो सकता है, यहाँ व्यक्त किये गए विचारों, मुद्दों से आप सहमत न हों, ऐसे में लोकतंत्र और पत्रकारिता के आदर्श मूल्यों की रक्षा के लिए हम यहाँ हमारे विरोधी विचारों -आवाजों को भी स्थान देंगे। आप अपने अमूल्य सुझाव, विचार, प्रतिक्रिया व आपत्तियां हमें ईमेल से भेजें। हम यहां उन्हें सहर्ष प्रकाशित करेंगे। फिलहाल, इस श्रंखला की शुरुआत हम बुंदेलखंड क्षेत्र के चर्चित विषय “मानव कल्याण विकासवादी संस्थान” से कर रहे हैं। “बड़े लड़इया महुबे वाले, इनकी मार सही न जाए! भीख नहीं ये न्याय मांगते, वरना सच भी बौरा जाए!!” बुंदेलखंड की गौरवगाथा अखंड बुंदेलखंड, बुलंद बुंदेलखंड। जी हाँ दोस्तो! इसी बलवती भावना के साथ मानव संसाधन, प्राकृतिक धरोहर, खनिज सम्पदा, लड़ाकों-बहादुरों, रणबांकुरों की ऐतिहासिक वीरभूमि बुंदेलखंड आजकल अपने अस्तित्व और अस्मिता की लड़ाई लड़ रहा है। बुंदेलखंड का सदियों से सूखाग्रस्त होना और उसकी पृष्ठभूमि में रोजी-रोटी और रोजगार का अभाव परिणाम स्वरुप शहरी पलायन इसका स्थाई भाव बन चुका है। लेकिन इसके बावजूद बुंदेली माटी में जन्‍मी अनेक विभूतियों ने न केवल अपना बल्कि इस अंचल का नाम खूब रोशन किया और इतिहास में अमर हो गए। मसलन, गोस्वामी तुलसी दास, झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, डॉ॰ हरिसिंह गौर, दद्दा मैथिली शरण गुप्त, महान चन्देल शासक बिधाधर चन्देल, आल्हा-ऊदल, महाराजा छत्रसाल, राजा भोज, ईसुरी, कवि पद्माकर, मेजर ध्यान चन्द्र, माधव प्रसाद तिवारी आदि अनेक महान विभूतियाँ इसी क्षेत्र से सम्बंधित हैं। बुंदेलखंड का इतिहास भूगोल इतिहास, संस्कृति और भाषा के मद्देनजर बुंदेलखंड बहुत विस्तृत प्रदेश है। लेकिन इसकी भौगोलिक, सांस्कृतिक और भाषिक इकाइयों में अद्भुत समानता है। बुंदेलखंड क्षेत्र जो उत्तर में यमुना, दक्षिण में विंध्य पलेटो की श्रेणियों, उत्तर-पश्चिम में चंबल और दक्षिण-पूर्व में पन्ना-अजयगढ़ श्रेणियों से घिरा हुआ है, बुंदेलखंड के नाम से जाना जाता है। इसमें उत्तर प्रदेश के जालौन, झांसी, ललितपुर, चित्रकूट हमीरपुर, बाँदा और महोबा तथा मध्य-प्रदेश के सागर, दमोह, टीकमगढ़, छतरपुर, पन्ना, दतिया के अलावा भिंड जिले की लहार और ग्वालियर जिले की मांडेर तहसीलें तथा रायसेन और विदिशा जिले का कुछ भाग भी शामिल है। हालांकि ये सीमा रेखाएं भू-संरचना की दृष्टि से उचित कही जा सकतीं। बुलंद बुंदेलखंड खंड-खंड आज बुंदेलखंड में जिस मुद्दे की सबसे ज्यादा चर्चा है वह है तमाम प्राकृतिक सम्पदा होने के बावजूद बुंदेलखंड का भयंकर सूखाग्रस्त और अभावग्रस्त होना। प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री इत्यादि राहतकोष से बुंदेलखंड को सैकड़ों- हज़ारों करोड़ रुपए की राहत सामग्री और धनराशि मिलने के बावजूद राजनैतिक उदासीनता बुंदेलखंड के पिछड़ेपन का मुख्य कारण है। विकासवादी महासंग्राम की शुरूआत बुंदेलखंड में विकासवादी महासंग्राम की शुरूआत सन २०१० में ही हो गयी थी जब “मानव कल्याण विकासवादी संस्थान” की स्थापना हुई लेकिन किसी कारणवश धरातल पर इसका आगाज़ नहीं हो सका। वास्तव में यह “मानव कल्याण विकासवादी संस्थान” संस्था सच्चे सामाजिक और मानवीय कार्य करती है और महामिशन के तौर पर विकासवादी महासंग्राम की शुरूआत इसके संस्थापक अध्यक्ष चन्द्रशेखर वर्मा ने तमाम सरकारी मेहमानों के समक्ष २०१४ में झाँसी में कर दी थी। जिसके जरिए देश – दुनिया में एक ऐसे नव निर्माण का सपना देखा गया जहाँ पर अमीर-गरीब, ऊँच-नीच, छोटे-बड़े का कोई भेद न हो या छुआ-छूत न हो और सबको काम करने का अधिकार हो, नौकरी या कमाई की गारंटी हो, लोगों को उनके निजी आस्था – विश्वास के साथ जीने की छूट हो, हर नागरिक को आज़ादी से रहने का अधिकार हो। परमानेंट जॉब एक्ट” बनाने की मांग जब से वर्मा ने देश में गरीबी और बेरोजगारी के खिलाफ खुशहाल जीवन जीने के लिए केंद्रीय और सभी राज्य सरकारों से “परमानेंट जॉब एक्ट” बनाने हेतु देशव्यापी गैरराजनैतिक आंदोलन जिसे उन्होंने विकासवादी महासंग्राम का नाम दिया है, का आगाज़ किया है, तबसे सबकी, खासकर पुलिस, प्रशासन और समाज के एक तबके विशेष की नींद उड़ गई है। अपने इसी मिशन के तहत उन्होंने लोगों को नौकरी और काम देना शुरू किया ही था कि इन्हीं लोगों ने अर्थात स्थानीय छुटभैय्ये नेताओं, दलालों और प्रशासक ने उन्हें ठग,जालसाज़,धोखेबाज़ जैसे अलंकरणों से आभूषित करके दबोच लिया और जेल में ड़ाल दिया। फर्जी छापे की तुगलकी कार्यवाई जबकि सच्चाई यह है कि लगभग दो माह बीत गए जब इस फर्जी छापे की तुगलकी कार्यवाई की गई, लगभग दो वीक हो गए जब संस्थापक को जेल में ड़ाल दिया गया, उनके ऊपर लगाया गया एक भी आरोप सिद्ध नहीं हुआ है और न होने का कोई चांस है क्योंकि नियमानुसार पुलिसिया कार्रवाई के एक महीने के भीतर अगर कोई शिकायत करता तो वह मान्य होती लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ और अब उसका भी वक़्त निकल चुका है, संस्था या संस्थापक के खिलाफ एक भी सदस्य ने शिकायत दर्ज नहीं की है। जिनकी शिकायत पर कार्यवाई की गई वे सब बाहरी लोग हैं और उनके अपने-अपने निहित स्वार्थ है। तो उन्होंने ऊँगली टेढ़ी कर ली मसलन, इनमें से कुछ नेता, पत्रकार, वकील, अफसर की खाल में घुसे दलाल हैं जिन्होंने संस्था को शुरू में जमकर लूटा लेकिन जैसे ही संस्था ने लुटने से मना कर दिया, तो उन्होंने ऊँगली टेढ़ी कर ली। इन लोगों ने अपने मतलब के लिए इस विराट ह्रदय वाले संस्थान को एक नहीं कई घाव दिए, तरह-तरह से बदनाम किया। स्थानीय मीडिया को मोहरा बनाया गया। जैसे यह उड़ाया गया कि यह संस्था न होकर कोई प्लेसमेंट सर्विस है, जिसका काम सिर्फ लोगों को जॉब दिलाना है। जबकि १२ साल की रिसर्च से निकले संस्था के कुल १२ प्रोजेक्ट हैं जिनमें से कई पर कार्य शुरू हो चका था और कई पर शुरू होना था। बुलंद बुंदेलखंड सीरीज पार्ट-1…..जारी ––ईश्वर पाल सिंह । Email: ipspromax@gmail.com

One thought on “पहले स्वतन्त्रता संग्राम का साक्षी बुंदेलखंड आज फिर महासमर की राह पर”

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