मनसे की रैलियों से बौखलाई बीजेपी, राज ने बदली राज्य की चुनावी फ़िज़ां

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना – मनसे अध्यक्ष राज ठाकरे

मनसे की रैलियों से बौखलाई बीजेपी, राज ने बदली राज्य की चुनावी फ़िज़ां

राज ठाकरे की रैलियों में जुट रही जबर्दस्त भीड़, मनसे नहीं लड़ रही लोकसभा चुनाव

मोदी मुक्त भारत के लिए राज ठाकरे की हुंकार, मनसे के जलसे बने आकर्षण का केंद्र

महाराष्ट्र में राज ठाकरे के हमलों से तिलमिलाई बीजेपी चुनाव आयोग की शरण में

आलेख विशेष / ईश्वरपाल सिंह यादव

मुंबई: महाराष्ट्र में भाजपा, कार्यवाहक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के खिलाफ राज ठाकरे के तूफानी हमलों से बीजेपी बुरी तरह तिलमिला गई है और अब वह चुनाव आयोग की शरण में जा पहुंची है जहाँ भाजपा के शिक्षा मंत्री विनोद तावड़े ने पूछा है, राज ठाकरे की राजनैतिक पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) कहीं से लोकसभा चुनाव नहीं लड़ रही है फिर भी राज ठाकरे दनादन जनसभाएं करके भाजपा, नरेंद्र मोदी और अमित शाह को गरिया रहे हैं, आखिर उनकी चुनाव प्रचार रैलियों का खर्चा कहाँ से आ कर रहा है? जिस पर पलटवार करते हुए राज ठाकरे ने भी भाजपा से पूछा है, नरेंद्र मोदी और अमित शाह के चुनाव प्रचार की रैलियों पानी की तरह बहाया जा रहा पैसा कहाँ से आ रहा है, ठीक मेलोडी की तर्ज़ पर, पहले अपना बताओ, और फिर मेरा जान जाओ।

गुजरात मॉडल से हुई मोदी के झूठ की शुरूआत

बीजेपी के खिलाफ राज ठाकरे के आग उगलते शोलों ने महाराष्ट्र की चुनावी फ़िज़ां और बिसात बदल दी है। अपनी चुनावी रैलियों में मनसे अध्यक्ष राज ठाकरे हर रैली के मंच पर ही मोदी शाह के वीडियो चलाकर मोदी शाह के हर झूठ की पोल खोल रहे हैं। विपक्ष के शीर्ष नेतृत्व पर ऐसा सीधा और तीखा हमला कभी नहीं देखा गया है। वह कहते हैं कि मोदी और शाह देश के ये दो कलंक हैं, इनके कारण आज भारत में लोकतांत्रिक इमरजेंसी लगी है जिसे हटाना होगा। वह साथ ही यह भी कहते हैं कि उनकी इनसे कोई निजी दुश्मनी नहीं है। गुजरात मॉडल का झूठा प्रचार करके जब सन 2014 में मोदी सत्ता में आये तो देश के साथ साथ वह भी उनके झूठे झांसे में आ गए और उन्होंने खुद मोदी को वोट दिया था। लेकिन जल्दी ही उन्हें समझ में आ गया था कि उनके साथ धोखा किया गया है, दिल्ली की सत्ता हथियाने के लिए बेहद चालाकी से गढ़ा गया गुजरात मॉडल एक झूठ और धोखा था।

जनसभाओं में भीड़ गुस्से की अभिव्यक्ति

गौरतलब है कि गुजरात मॉडल तो शायद मोदी का पहला झूठ था या उनके झूठ की शुरूआत थी, उसके बाद उन्होंने न जाने कितने झूठ बोले हैं और अभी भी रोज सुबह जागने से लेकर रात सोने तक मोदी लगातार बेशर्मी से झूठ बोल रहे हैं, जाहिर है कोई एक-दो झूठ बोलने से इंटेरनेशनल फेंकू नहीं बन जाता। अब पांच साल के लाखों झूठ के पाप का घड़ा इतना बड़ा हो गया है कि वह फटने ही वाला है। चंद सोशल मीडिया के मोदी भक्तों को छोड़कर राज ठाकरे की तरह देश का हर जागरूक युवा और हर नागरिक जिसने मोदी को वोट दिया था आज ठगा हुआ महसूस कर रहा है और वह मोदी के खिलाफ गुस्से में है, यही कारण है कि राज ठाकरे की जनसभाओं में जो अप्रत्याशित भीड़ दिख रही है वह उसी गुस्से की अभिव्यक्ति है।

इन जगहों पर खींचेंगे राजनैतिक जमीन

राजनैतिक पंडितों के अनुसार, राज ठाकरे की जनसभाओं से पहले जहाँ महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना-आरपीआई युति और कांग्रेस-एनसीपी में कांटे की टक्कर दिख रही थी वहीँ अब चुनावी समीकरणों में कुछ बदलाव होता हुआ दिख रहा है। महाराष्ट्र में लोकसभा की कुल 48 सीटें है। मुंबई, पुणे, नासिक और ठाणे में राज ठाकरे का अच्छा जनाधार है। यहां लोकसभा की कुल 14 सीटें है। राज ठाकरे इन सीटों पर बीजेपी-शिवसेना को नुकसान पहुंचा सकते हैं। लोकसभा चुनाव 2014 में बीजेपी ने 23, शिवसेना ने 18, एनसीपी ने चार और कांग्रेस ने दो सीटों पर जीत हासिल की थी। लेकिन उस वक्त, कांग्रेस सरकार के निकम्मेपन, अहंकार और अन्ना आंदोलन जिसने मोदी लहर के लिए जमीन तैयार की थी, उस पर देश सवार था। बता दें कि भाजपा के साथ गठबंधन करने से पहले शिवसेना अकेले चुनाव लड़ने की न केवल घोषणा कर चुकी थी बल्कि उसकी जोर-शोर से तैयारी भी शुरू हो चुकी थी। शिवसेना सुप्रीमो उद्धव ठाकरे का रुख मोदी सरकार के खिलाफ आक्रामक होने के कारण तब उसका चुनावी ग्राफ काफी अच्छा जा रहा था लेकिन भाजपा के साथ गठबंधन करने के बाद उस ग्राफ में काफी गिरावट आई है।

ऊहापोह में शिवसेना कार्यकर्ता

शिवसेना कार्यकर्ता भाजपा के खिलाफ खुले संघर्ष के लिए कमर कस चुका था अब उसकी हालत कुरुक्षेत्र में खड़े अर्जुन की तरह हो गयी है और उसके शिवसेना सुप्रीमो उद्धव ठाकरे की कुरुक्षेत्र के सारथी कृष्ण की तरह जो अपना उपदेश देना भूल गया है। ऐसे में अब शिवसेना कार्यकर्ता कैसे, किसके साथ मिलकर और किसके खिलाफ मैदान में उतरे इसे लेकर वह भ्रमित है। इससे वह ठगा हुआ भी महसूस कर रहा है। उसे समझ में नहीं आ रहा कि आखिर शिवसेना सुप्रीमो की ऐसी क्या मजबूरी आ पड़ी थी जो अमित शाह से एक मुलाकात के बाद अचानक उन्हें भाजपा के साथ गठबंधन करना पड़ा। चलो मान भी लिया जाये कि उनकी कोई मजबूरी रही होगी लेकिन वह अपनी समस्या किससे कहे, उसको अपनी मुश्किल और मुसीबतों का समाधान कहीं नज़र नहीं आता।

ओजस्वी भाषण देने में माहिर राज ठाकरे

बहरहाल, हम वापस आते हैं अपने मूल मुद्दे राज ठाकरे पर, देखिये महाराष्ट्र में प्रखर वक्ताओं का बड़ा अकाल है। अपने धाँसू, चुटीले और धारधार भाषण के लिए लोकप्रिय बालासाहेब ठाकरे अब रहे नहीं। उनके असली वारिस उद्धव ठाकरे के भाषण भी कम रोचक, धारदार और व्यंग्य भरे नहीं होते हैं लेकिन वो दिखते कम हैं। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस शुरू में तो अच्छा भाषण देते थे लेकिन अब बोर करते हैं। सत्ता का शहद ही ऐसा होता है कि उसमें अच्छे-अच्छों की धार कुंद हो जाती है। शरद पवार और नितिन गडकरी की हम यहाँ बात नहीं करेंगे क्योंकि वे दोनों राष्ट्रीय स्तर पर चले गए। ऐसे में महाराष्ट्र में अकेले राज ठाकरे ही नज़र आते हैं जिनके पास ओजस्वी भाषण कला और प्रभावशाली नेतृत्व क्षमता का खजाना भरा पड़ा है। लेकिन वह भी तब तक, जब तक कि वे सत्ता के खिलाफ खड़े रहकर एक विद्रोही आंदोलनकारी नेता की तरह ख़ालिश जनसरोकार के मुद्दों पर बोलें और डटे रहें।

मीडिया का ही काम राज ठाकरे ने किया 

एक बात और जिसके लिए राज ठाकरे को याद रखा जाएगा जिस तरह ऑडियो-वीडियो तकनीक को उन्होंने जनसभा के मंच से जोड़ा है वह एक नई और प्रभावी शैली है जो मंच से कही गयी अपनी बात, छींटा-कशी को और प्रभावी तरीके से लोगों तक संप्रेषित करती है। हाथ कंगन को आरसी क्या- पढ़े लिखे को फ़ारसी क्या, राज ठाकरे अपने भाषण में लगाए गए अपने आरोपों को और सामने वाले के झूठ को वीडियो दिखाकर हाथोंहाथ सिद्ध कर देते हैं, उसका पर्दाफाश कर देते हैं। यानि आज मोदी समर्थक मीडिया जिसे पहले दरबारी मीडिया कहा जाता था और आज उसे गोदी मीडिया कहा गया जो धनलोलुपता और सत्ता लोलुपता में लगा है। जो जनसरोकार के मुद्दों से मुंह मोड़कर, जन जागरूकता का धर्म निभाने के बजाय सरकारी भोंपू बन गया है, जो काम मीडिया को करना चाहिए था वह काम आज राज ठाकरे को करना पड़ रहा है और बखूबी कर रहे हैं। उनकी जन सभाओं में उमड़ती भीड़ और गड़गड़ाती तालियां और उद्घोषित नारे इसका प्रमाण है।

मोदी जी ने देश को पचास साल पीछे धकेल दिया

राज ठाकरे ने अपनी जनसभाओं को अपने खास अंदाज से यथार्थवादी मुद्दों से इतना रोचक और महत्वपूर्ण बना दिया है कि यही भोंपू मीडिया उनके भाषणों को लाइव दिखा रहा है। कुछ लोग यह कह कर राज ठाकरे का मजाक उड़ा रहे हैं कि पहले तो राज ठाकरे ने खुद ही मोदी का समर्थन किया था इसलिए अब उनका विरोध करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है, इस तर्क में कोई दम नहीं है क्योंकि इस बारे में खुद राज ठाकरे का कहना है कि बदलती हुई परिस्थितियों के हिसाब से आदमी के किरदार बदलते हैं। वह वक्त ऐसा था जब सारे देश ने मोदी का समर्थन किया था लोगों को मोदी से बड़ी उम्मीदें थी लेकिन मोदीजी ने इतने बड़े जनादेश का सम्मान नहीं किया और उन्होंने न केवल अपना और देश का वक्त और पैसा बर्बाद किया बल्कि पांच सालों में देश को पचास साल पीछे धकेल दिया।    

भाजपा, मनसे ने माँगा एक-दूसरे की रैलियों का हिसाब

भाजपा के शिक्षा मंत्री विनोद तावड़े जिन्होंने राज ठाकरे की रैलियों का हिसाब चुनाव आयोग से माँगा है उन्होंने ठाकरे की रैलियों पर तंज कसते हुए कहा है कि राज ठाकरे की रैलियां टूरिज्म सर्कस से और अधिक कुछ नहीं हैं। जिसके प्रायोजक शरद पवार हैं यह सब जानते हैं। यह तो और अच्छी बात है अगर राज ठाकरे लोगों का मनोरंजन करने के साथ-साथ महाराष्ट्र पर्यटन को भी प्रमोट कर रहे हैं तो इसके लिए तो उन्हें राज्य सरकार कि तरफ से अवार्ड मिलना चाहिए। दरअसल, भाजपा-शिवसेना-आरपीआई युति के स्थानीय नेता बुरी तरह बौखला गए हैं क्योंकि राज ठाकरे ने उनकी राजनैतिक जमीन खींच ली है। लेकिन विनोद तावड़े इस बात से बिलकुल सहमत नहीं हैं उनका कहना है कि राज ठाकरे कौन सी नई बात कर रहे हैं वो वही घिसी-पिटी पुरानी बातों को ही दोहरा रहे है, जिनमें अब कोई दम नहीं है। राज ठाकरे को कोई गंभीरता से नहीं लेता, उनकी रैलियों में लोग सिर्फ अपने मनोरंजन के लिए आ रहे हैं और उनकी युति का वोट बैंक सुरक्षित है, लोग मोदी के लिए मन बना चुके हैं, वह सिर्फ युति के प्रत्याशी को ही वोट देगा।

अब होगा मोदी-मुक्त भारत

उधर राज ठाकरे का स्पष्ट कहना है कि पिछले पांच साल में मंहगाई, बेरोजगारी, किसान, जवान, नौजवान, व्यापारी की बदहाली, नोटबंदी और जीएसटी जैसी मोदी सरकार की दसियों जन विरोधी नीतियों और उनके झूठ से जो तकलीफ लोगों को हुई है मैं उसको उजागर कर रहा हूँ। मोदी ने बहुत कोशिश कर ली उनसे कांग्रेस मुक्त भारत तो हुआ नहीं लेकिन अब मोदी-मुक्त भारत जरूर होगा। देश को मोदी-मुक्त करना एक इमरजेंसी है। इससे किसको क्या फायदा या नुकसान होता है यह सोचना मेरा काम नहीं है। और फिर मैं तो किसी सीट पर चुनाव ही नहीं लड़ रहा हूँ तो मुझे तो इससे कोई फायदा मिलने का सवाल ही नहीं उठता।

राज ठाकरे ने दो साल पूर्व ही कह दिया था

खैर, फ़िलहाल, हम तो यही कहेंगे कि अभी मनसे भले कोई चुनाव नहीं लड़ रही हो लेकिन आने वाले वक्त में वह चुनाव नहीं लड़ेगी इसकी क्या गारंटी है? मात्र चार महीने बाद ही विधान सभा के चुनाव होने हैं जिसमें स्वाभाविक है, राज ठाकरे जमकर अपनी फसल काटेंगे। जाहिर है, उन्होंने अभी राजनीति से कोई सन्यास नहीं लिया है। चलते-चलते एक और बात उनके लिए जो राज ठाकरे को हलके में लेते हैं, ये वही राज ठाकरे हैं जिन्होंने आज से दो साल पूर्व अक्टूबर 2017 में ही कह दिया था कि मोदी सरकार सन 2019 का चुनाव आते-आते देश में कारगिल युद्ध जैसे हालत पैदा कर देंगे, क्या हुआ पुलवामा में, हर तरफ से आरोप लगते रहे कि ये मोदी ने करवाया है, वो मोदी ने करवाया है, चुप क्यों हैं? आज तक उन्होंने इतने बड़े और संगीन आरोपों का कोई जवाब क्यों नहीं दिया अगर आरोप गलत हैं तो आरोप लगाने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई, आतंकियों द्वारा जब वहां बारूद लाया गया राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल क्या कर रहे थे? मोदी सरकार में सवाल ही सवाल हैं जवाब एक भी नहीं, जिसने ज्यादा सवाल किए, आज देख लो उनकी क्या हालत है, या वह खुद ही गायब हो जाता है।