भगत सिंह ने कभी इस देश के युवा को बंदूक उठाने के लिए प्रेरित नहीं किया
अगर आप भगत सिंह को सिर्फ इसलिए जानते या मानते हैं क्यों कि वो देश को आजाद कराने के लिए हँसते हुए फाँसी के फंदे पर झूल गए थे। या इसलिए कि उन्होंने ब्रिटिश अधिकारी सौंडर्स की हत्या की थी या इसलिए क्यों कि उन्होंने असेम्बली में बम विस्फोट कर खुद की गिरफ़्तारी दी थी तो आपको कोई अधिकार नहीं है कि आप भगत सिंह का नाम ले और बड़ी बड़ी बाते करें।
इस लेख को आगे पढ़ने पर हो सकता है आपको अपने आप पर शर्मिंदगी महसुस हो या आप लेखक को कोसे या आप भगत सिंह को मानना ही छोड़ दें। आज आप जिस भगत सिंह को जानते या मानते हैं भगत सिंह ऐसे कभी नहीं थे। न ही वो ऐसा बनना चाहते थे। भगत सिंह ने कभी इस देश के युवा को बंदूक उठाने के लिए प्रेरित नहीं किया जब कि भगत सिंह तो चाहते थे कि इस देश का हर एक युवा कलम उठाए। पढ़े - लिखे और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करे। भगत सिंह खुद को नास्तिक बताते थे, इसका मतलब यह नहीं है कि वो ईश्वर को नहीं मानते थे। लेकिन दुनियाँ को पाखंड और आडंबरो से बचाना चाहते थे। वह हमेशा बराबरी की बात करते थे। वह चाहते थे कि इस देश के लोग ऊंच - नीच, जात - पात, धर्म के आधार पर भेदभाव को छोड़कर बराबर के भाव से रहें। भगत सिंह का एक नारा था जो बहुत प्रचलित है 'इंकलाब ज़िन्दाबाद'! लेकिन इसको अगर पूरा किया जाए तो यह होगा इंकलाब जिन्दाबाद! साम्राज्यवाद मुर्दाबाद! इंकलाब का अर्थ है "बदलाव" भगत सिंह हमेशा बदलाव के पक्षधर थे। साम्राज्यवाद का अर्थ है "राज्य को बढ़ाने की नीति"। फिर चाहे वह अंग्रेजो द्वारा बढ़ाया जा रहा हो, राजाओं द्वारा, सामंतों द्वारा, जागीरदारो के द्वारा या किसी आम नागरिक द्वारा। क्यों कि जहाँ साम्राज्य को बढ़ाने की कोशिश होगी वहाँ एक लालसा होगी, लालच होगा। और लालच में इंसान कभी किसी का भला नहीं करता, वह शोषण करता है। और भगत सिंह लोगों को इसी शोषण से मुक्ति दिलाने की बात करते हैं। लाहौर साजिश केस में विशेष न्यायाधिकरण के सामने भगत सिंह ने कहा था, साम्राज्यवाद मनुष्य के हाथों मनुष्य और राष्ट्र के हाथों राष्ट्र के शोषण का चरम है। साम्राज्यवादी अपने हित और लूटने की योजनाओं को पूरा करने के लिए न सिर्फ न्यायालयों और कानूनों का कत्ल करते हैं, बल्कि साजिश भी रचते हैं।
वह जातिवाद, साम्प्रदायिकता, साम्राज्यवाद, पूंजीवाद, धार्मिक कर्मकांड व पाखंड का विरोध करते थे। भगत सिंह आज जो भारत है वैसा भारत कभी नहीं चाहते थे जो धर्म और जातियों के नाम पर लड़े। मगर आज की राजनीति ने सोशल मीडिया के जरिए हर एक व्यक्ती को कुंठित कर दिया है। आज का युवा जाती व धर्म से ऊपर उठकर सोच ही नहीं पा रहा है। वह बस हथियार उठाकर किसी को मारने में ही खुद को भगत सिंह समझता है। जबकि सौंडर्स की हत्या करने के बावजूद भगत सिंह अहिंसा के पक्षधर थे।
लेकिन अगर आप भगत सिंह का खुद का लिखा पढ़ेंगे तो पाएंगे कि जैसा भारत भगत सिंह चाहते थे आप तो उससे एकदम विपरित भारत बना रहें हैं।
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